यक़ीन का सफ़र

एपिसोड 24 – भूसे के गोले का भीतरी आधार खोलना

सही और भ्रामक तर्क में अंतर कैसे करें? भूसे के गोले की उपमा से विकासवाद के प्रमाणों की समीक्षा और आलोचनात्मक सोच विकसित करने की पद्धति समझें।

भूमिका: विकासवाद का मिथक और भूसे का गोला

अस्सलामु अलैकुम। एक बड़ा गोला छोटे-से भीतरी आधार से शुरू हुआ, फिर भूसे के खेत में लुढ़कते-लुढ़कते बढ़ गया। देखने वाला उसे बड़ी चीज़ समझता है, मगर असल में वह भूसा, कूड़ा, सूखे पत्ते और धूल है। विकासवाद का मिथक भी ऐसा ही है: यह कि जीव बिना उद्देश्य और पहले से तय बनावट के संयोगों से बने।

बुद्धि और विज्ञान से टकराने वाले मिथकीय आधार अमान्य तर्क-विधियों से मिले। दोनों से बना भीतरी आधार डेढ़ सदी तक ब्रह्मांड के अवलोकनों के खेत में लुढ़कता रहा और बड़ा गोला बन गया। मिथक के समर्थक जब किसी जीवाश्म या किसी कथित निरुपयोगी अंग की बात करते हैं तो वे सब तिनके हैं। भीतरी आधार खोलने से पहले हम इन तिनकों में नहीं उलझेंगे।

भीतरी आधार खोलना: मूल धारणाएँ और तर्क की विधियाँ

एपिसोड (डार्विन के सिद्धांत की निष्पक्ष समीक्षा) और फिर एपिसोड (बकरी, चाहे वह उड़ जाए) में हमने मिथकीय आधारों को खोला और बताया कि वे मिथक क्यों हैं। अब हमें उन छलपूर्ण तर्क-पद्धतियों को खोलना है जिन्होंने जैविक और जीवाश्म निरीक्षणों को इकट्ठा कर इन आधारों से जोड़ दिया।

हमें यह भी दिखाना है कि झूठे विज्ञान के पुरोहितों ने सृष्टि की उन वास्तविकताओं को, जो उनके मिथक को तोड़ देती हैं, कुछ लोगों की नज़र में उसे समर्थन देने वाले प्रमाणों में कैसे बदल दिया।

सही सोच के नियम सीखने का महत्व

हम क्रमबद्ध विषय और सोचने के नियम रखेंगे, ऐसे आधार जिन पर आगे निर्माण करें। आप मेरी बात सुनकर सहमत हों, फिर मिथक के अनुयायी या उसे इस्लामी रूप देने वाले की बात सुनकर भी सहमत हो जाएँ। इससे ख़ुद से परेशान हों कि एक बात इधर खींचती है, दूसरी उधर; सत्य-असत्य पहचान नहीं पा रहे, किसी चीज़ पर दृढ़ विश्वास नहीं बना पा रहे।

लेकिन साथ मिलकर सही सोच के नियम सीखने पर आप पहचान सकेंगे कि किसकी बात सही दिशा में है। उसे जितना सुनेंगे, समझ-बूझ के साथ विश्वास उतना मज़बूत होगा और इंशाअल्लाह मार्गदर्शन तथा इत्मीनान बढ़ेगा। इसके विपरीत वह बात भी पहचानेंगे जो बुद्धि को भटकाती और बिगाड़ती है, फिर भी उसे संबोधित करने और उसका सम्मान करने का दिखावा करती है। तब समझेंगे कि हर कथित प्रमाण वास्तव में प्रमाण नहीं होता। “कह दो: बुरा और अच्छा बराबर नहीं, चाहे बुरे की अधिकता तुम्हें अच्छी लगे। तो ऐ बुद्धि वालो! अल्लाह से डरो, ताकि सफल हो।” [अल-माइदा 5:100]

आप पहचानेंगे कि कौन तार्किक भ्रांतियाँ और मनोवैज्ञानिक चालें चलाने की कोशिश करता है। उसे जितना सुनेंगे, उतना विश्वास होगा कि उसका माल मिलावटी है, या वह स्वयं अनजाने मिथकों से धोखा खा रहा है। भाई और बहन, अगर आप इन एपिसोड की बातों से सहमत हों, तो मैं बुलाता हूँ कि केवल मिथक के अनुयायियों को नहीं, मुझे और उसके आलोचकों को भी उन्हीं कसौटियों पर परखें। देखें कि तर्क में कौन सही और कौन ग़लत है।

श्रृंखला की पद्धति: गलत तर्कों को खोलना

पुस्तकों और इंटरनेट पर चर्चाओं तथा जवाबों का विशाल भंडार है। विकासवाद के मिथक की आलोचना में वक्ताओं ने बहुत मेहनत की है। कुछ में कमियाँ हैं, कुछ बहुत मूल्यवान हैं, मगर वे बिखरे सोने के कण हैं। “भूसे के गोले का भीतरी आधार खोलना” विषय में हम चर्चा का सैद्धांतिक ढाँचा और तार्किक क्रम बनाना चाहते हैं।

हम अमान्य तर्कों को पहचानकर कुछ निश्चित शीर्षकों में व्यवस्थित करेंगे। उसके बाद किसी को सुनकर पूछ सकेंगे: यह तर्क सही है या ग़लत? ग़लत है तो किस प्रकार के अमान्य तर्क में आता है? किसी को बहुत देर सुनें और वह मिथक की सत्यता के बहुत-से कथित प्रमाण जुटाए। फिर ध्यान से जाँचकर आपको हैरानी हो कि वे सब अमान्य तर्क की एक ही किस्म के उदाहरण हैं।

क़ुरआन अल्लाह के अस्तित्व और गुणों के प्रमाण देकर रुक सकता था। फिर भी उसने असत्य वालों के तरीकों और अपने असत्य के प्रचार की चालों को विस्तार से बताया: “इसी तरह हम आयतों को खोलकर बताते हैं, ताकि अपराधियों का रास्ता स्पष्ट हो जाए।” [अल-अनआम 6:55] आइए बुद्धि को बिगाड़ने का अपराध करने के तरीके देखें।

हम “मच्छर की बनावट” या ब्रह्मांड की किसी भी चीज़ पर दो मिनट का वीडियो दिखाकर चिंतन कर सकते थे। स्वस्थ बुद्धि और हृदय वाला इंसान उद्देश्य तथा इच्छा से की गई ईश्वरीय रचना के प्रमाण के तौर पर उतने को पर्याप्त पाता। यह महान, स्पष्ट और स्वयंसिद्ध ब्रह्मांडीय सत्य संदेह का विषय कैसे बना? मिथक के अनुयायियों ने विज्ञान के नाम पर कौन-सा भ्रम और अज्ञान फैलाया, जिससे बुद्धि इससे अंधी हुई? कुछ युवाओं को इतिहास की सबसे बेतुकी और मूर्खतापूर्ण बात कैसे मनवाई कि जीव बिना उद्देश्य, ज्ञान या इच्छा के संयोगों से बने?

बुद्धि के नाम पर बुद्धि की हत्या और विज्ञान के नाम पर विज्ञान में जालसाज़ी कैसे होती है? सामान्य रूप से दिमाग़ कैसे धोए जाते हैं? इंशाअल्लाह, अगले एपिसोड में यही देखेंगे। आप पाएँगे कि तार्किक भ्रांतियों और मनोवैज्ञानिक चालों पर कोर्स (Course) देने वाले को बस विकासवाद का मिथक और उसके पुरोहितों के प्रचार के तरीके चुन लेने हैं। इस विषय में सारी भ्रांतियाँ और चालें मिल जाएँगी।

भाइयो, सरलता और सटीकता साथ रखने के लिए अमान्य तर्कों पर एपिसोड की शुरुआत रोचक प्रतीकात्मक अभिनय-दृश्यों से करेंगे, जो बात समझा दें। इससे भूसे के फूले गोले का भीतरी आधार पूरी तरह खुलेगा और मिथक पर चर्चा का पद्धतिगत ढाँचा पूरा होगा। फिर अपनी कसौटी तय करके यात्रा आगे बढ़ाएँगे। मूल धारणाओं और प्रमाणों को एक-एक करके विस्तार से लेंगे: जीवन की उत्पत्ति, उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन, जीवाश्म, आणविक जीवविज्ञान और अन्य विषय। ऊब और अनावश्यक विस्तार के बिना, उतना ही जितना सत्य विश्वास बनाने और छद्मविज्ञान की परतें खोलने के लिए चाहिए। ताकि भाई, आप स्वयं आलोचनात्मक सोच का कौशल पाएँ और आगे हर सामने आने वाली बात पर उसे लागू करने लगें।

निष्कर्ष: विश्वास और ईमान बनाने की यात्रा

इस सबके दौरान इंशाअल्लाह सबसे आम सवालों के सुदृढ़ जवाब देंगे: पश्चिम के अधिकांश वैज्ञानिक मिथक को क्यों स्वीकारते हैं? क्या सचमुच वे उससे संतुष्ट हैं? विकासवाद और इस्लाम में सामंजस्य की कोशिशों का क्या? और अन्य सवाल भी। यह उदाहरणों, आश्चर्यों और सीखों से भरी रोचक यात्रा होगी, जो गहरी आलोचनात्मक सोच विकसित करेगी और ज्ञान तथा अंतर्दृष्टि के आधार पर ईमान मज़बूत करेगी। इंशाअल्लाह तआला, हमारे साथ बने रहिए, प्रिय साथियो। अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह।


स्रोत: डॉ. इयाद क़ुनैबी की आधिकारिक वेबसाइट.