बुद्धिमान अभिकल्प: सृष्टि की रचना का तर्क
ब्रह्मांड और जीवों की व्यवस्था, सटीकता और जटिलता क्या बताती हैं? बुद्धिमान रचयिता के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क और संयोग की धारणा को समझें।
रचना और बुद्धिमत्ता
इस समय आप अपने कंप्यूटर के सामने बैठकर TheSigns.co वेबसाइट के लेख पढ़ रहे हैं। आप पहले से जानते हैं कि किसी लेखक ने इसे विशेष उद्देश्यों से लिखा है। आपके मन में कभी यह विचार नहीं आएगा कि यह वेबसाइट “संयोग” से अपने आप बन गई और महज़ “इत्तिफ़ाक़” से इंटरनेट पर आ पहुँची।
इसी तरह अपने कंप्यूटर को देखकर आपको संदेह नहीं होता कि उन्नत तकनीक रखने वाले इंजीनियरों ने इसे बनाया है। यह बात केवल कंप्यूटरों तक सीमित नहीं है। हम जानते हैं कि यहाँ-वहाँ एक-दूसरे पर रखी कुछ ईंटें भी किसी ने एक निश्चित योजना के अनुसार रखी होंगी। इसलिए जहाँ थोड़ी या बहुत व्यवस्था हो, वहाँ उस व्यवस्था को स्थापित करने और बनाए रखने वाला भी होना चाहिए।
किसी जटिल संरचना का अचानक पूर्ण रूप में सामने आना बताता है कि वह किसी बुद्धिमान कर्ता की रचना है। कंप्यूटर का उदाहरण जीवों पर भी लागू होता है। वास्तव में जीवन की बनावट इतनी सूक्ष्म और जटिल है कि उसकी तुलना किसी साधारण कंप्यूटर से नहीं की जा सकती। जीवन की मूल इकाई, कोशिका, मनुष्य की बनाई किसी भी तकनीकी वस्तु से कहीं अधिक जटिल है। विकासवाद के समर्थक वैज्ञानिक एच. थोर्प स्वीकार करते हैं कि “सबसे सरल कोशिका भी आज तक कल्पित किसी भी मशीन से अधिक जटिल ‘तंत्र’ है; मनुष्य द्वारा बनाई गई मशीनों की तो बात ही छोड़िए।” डब्ल्यू. आर. बर्ड, द ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज़ रिविज़िटेड, नैशविल: थॉमस नेल्सन कंपनी, 1991, पृ. 298–299।
इसके अलावा, यह अलघुकरणीय जटिलता वाला जीव अचानक और पूरी तरह विकसित रूप में प्रकट हुआ होगा।
इसलिए स्पष्ट है कि सभी जीव एक उच्चतर “अभिकल्प” की रचना हैं।
जिसे कभी “महान निर्माता” और कभी “उच्चतर अभिकल्प” कहा जाता है, वह और कोई नहीं, सभी प्राणियों को पैदा करने वाला अल्लाह है:
अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है।आकाशों तथा धरती की कुंजियाँ[12] उसी के पास हैं तथा जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों का इनकार किया, वही लोग घाटा उठाने वाले हैं।[12] अर्थात सबका विधाता तथा स्वामी वही है। वही सबकी व्यवस्था करता है। और सब उसी के अधीन तथा अधिकार में हैं।आप कह दें के ऐ अज्ञानो! क्या तुम मुझे आदेश देते हो कि मैं अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत (वंदना) करूँ?क़ुरआन — सूरह Az-Zumar (39:62–64)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5
प्रसिद्ध जैवरसायनज्ञ माइकल बीही अपनी किताब “डार्विन का ब्लैक बॉक्स” में इस निष्कर्ष की स्पष्टता बताते हैं:
“इन्हें न प्रकृति के नियमों ने बनाया, न संयोग ने और न अनिवार्यता ने; बल्कि इन्हें योजनाबद्ध ढंग से बनाया गया। अभिकल्पक जानता था कि पूरे होने पर ये तंत्र कैसे होंगे, फिर उसने इन्हें बनाया। धरती पर जीवन अपने सबसे बुनियादी स्तर पर, अपने सबसे महत्वपूर्ण घटकों में, बुद्धिमान गतिविधि का परिणाम है। बुद्धिमान अभिकल्प का निष्कर्ष स्वयं आँकड़ों से स्वाभाविक रूप से निकलता है… यह निष्कर्ष निकालना कि जैवरासायनिक तंत्रों की रचना किसी बुद्धिमान कर्ता ने की है, एक सामान्य प्रक्रिया है; इसके लिए तर्क या विज्ञान के किसी नए सिद्धांत की आवश्यकता नहीं। यह पिछले चालीस वर्षों में जैवरसायन के महत्वपूर्ण काम और इस विचार से सीधे निकलता है कि हम रोज़मर्रा में किसी चीज़ को बनाई हुई कैसे पहचानते हैं।” माइकल जे. बीही, डार्विन्स ब्लैक बॉक्स, न्यूयॉर्क: फ़्री प्रेस, 1996, पृ. 196।
माइकल बीही यह भी बताते हैं कि जीवित कोशिका से संबंधित नवीनतम खोजों का नास्तिक जगत में कैसा स्वागत हुआ:
“ पिछले चार दशकों में आधुनिक जैवरसायन ने कोशिका के रहस्य खोले हैं। यह प्रगति आसानी से नहीं हुई। इसके लिए दसियों हज़ार लोगों को अपने जीवन का बेहतरीन समय प्रयोगशाला के थकाने वाले काम में लगाना पड़ा… कोशिका, यानी आणविक स्तर पर जीवन का अध्ययन करने के इन सामूहिक प्रयासों का परिणाम एक ऊँची, स्पष्ट और तीखी पुकार है: “अभिकल्प!” यह नतीजा इतना स्पष्ट और अर्थपूर्ण है कि इसे विज्ञान के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए। विज्ञान की इस विजय पर दसियों हज़ार लोगों के मुँह से “यूरेका!” की पुकार उठनी चाहिए।
लेकिन न जश्न की कोई बोतल खोली गई, न तालियाँ सुनाई दीं। इसके बजाय कोशिका की अपार जटिलता के चारों ओर एक अजीब, संकोचभरी चुप्पी है। सार्वजनिक रूप से विषय उठने पर पैर बेचैनी से हिलने लगते हैं और साँसें भारी होने लगती हैं। निजी बातचीत में लोग कुछ सहज होते हैं; बहुत से लोग स्पष्ट प्रमाण को खुले तौर पर स्वीकार करते हैं, लेकिन फिर नज़रें झुका लेते हैं, सिर हिलाते हैं और बात आगे नहीं बढ़ाते। वैज्ञानिक समुदाय इस खोज का उत्साह से स्वागत क्यों नहीं करता? अभिकल्प को पहचानने की बात पर इतनी बौद्धिक सावधानी क्यों बरती जाती है? क्योंकि बुद्धिमान अभिकल्प को स्वीकार करना अल्लाह के अस्तित्व को स्वीकार करना है।” माइकल जे. बीही, डार्विन्स ब्लैक बॉक्स, न्यूयॉर्क: फ़्री प्रेस, 1996, पृ. 231–232।
संक्षेप में, ब्रह्मांड की इस अद्भुत व्यवस्था को देखने पर पता चलता है कि उसका अस्तित्व और संचालन अत्यंत सटीक मापों और इतनी जटिल व्यवस्था पर आधारित हैं कि केवल संयोग से उनकी व्याख्या नहीं की जा सकती। यह संभव नहीं कि इतनी सूक्ष्म व्यवस्थाएँ और संतुलन अपने आप बन गए हों या किसी महाविस्फोट के बाद महज़ संयोग से उत्पन्न हो गए हों। इसे केवल एक अलौकिक रचना स्वीकार करके समझा जा सकता है। अमेरिकी खगोलशास्त्र के प्रोफ़ेसर जॉर्ज ग्रीनस्टीन अपनी किताब द सिम्बायोटिक यूनिवर्स में स्वीकार करते हैं: “विभिन्न प्रमाणों पर नज़र डालते ही हमारे मन में यह विचार आता है कि इसमें किसी प्रकार की व्यवस्था—बल्कि अलौकिक व्यवस्था—की भूमिका अवश्य होगी।” ह्यू रॉस, द फ़िंगरप्रिंट ऑफ़ गॉड, दूसरा संस्करण, ऑरेंज, कैलिफ़ोर्निया: प्रॉमिस पब्लिशिंग कंपनी, 1991, पृ. 114–115।
ब्रह्मांड की यह अनुपम योजना और सामंजस्य निश्चय ही ऐसे सृष्टिकर्ता के अस्तित्व का प्रमाण हैं जिसका ज्ञान, सामर्थ्य और हिकमत असीम हैं; जिसने पदार्थ को शून्य से पैदा किया और जो निरंतर उस पर नियंत्रण और प्रभुत्व रखता है। यह सृष्टिकर्ता अल्लाह है, आकाशों, धरती और उनके बीच की हर चीज़ का रब:
क्या मनुष्य ने नहीं देखा कि हमने उसे वीर्य से पैदा किया? फिर अचानक वह खुला झगड़ालू बन बैठा।और उसने हमारे लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया, और अपनी रचना को भूल गया। उसने कहा : इन अस्थियों को कौन जीवित करेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी?आप कह दें : उन्हें वही (अल्लाह) जीवित करेगा, जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया और वह प्रत्येक उत्पत्ति को भली-भाँति जानने वाला है।वह जिसने तुम्हारे लिए हरे वृक्ष से आग पैदा कर दी, फिर तुम उससे आग[25] सुलगाते हो।[25] भावार्थ यह है कि जो अल्लाह जल से हरे वृक्ष पैदा करता है फिर उसे सुखा देता है जिससे तुम आग सुलगाते हो, तो क्या वह इसी प्रकार तुम्हारे मरने-गलने के पश्चात् फिर तुम्हें जीवित नहीं कर सकता?तथा क्या वह (अल्लाह) जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया, इस बात का सामर्थ्य नहीं रखता कि उन जैसे और पैदा कर दे? क्यों नहीं, और वही सब कुछ पैदा करने वाला, सब कुछ जानने वाला है?उसका आदेश, जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो केवल यह होता है कि उससे कहता है "हो जा", तो वह हो जाती है।अतः पवित्र है वह (अल्लाह), जिसके हाथ में प्रत्येक चीज़ का राज्य (पूर्ण अधिकार) है और तुम सब उसी की ओर लौटाए[26] जाओगे।[26] प्रलय के दिन अपने कर्मों का बदला प्राप्त करने के लिए।क़ुरआन — सूरह Yaseen (36:77–83)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5
संयोग की धारणा
सृष्टि के स्पष्ट प्रमाण के सामने नास्तिक केवल एक धारणा का सहारा लेते हैं: “संयोग”। यह मानकर कि महज़ संयोग से पूर्ण रचनाएँ बन सकती हैं, वे बुद्धि और विज्ञान की सीमाएँ लाँघ जाते हैं। ऐसा भी लगता है कि वे एक ऐसी हठधर्मी मान्यता में उतर जाते हैं जो संयोग की पूजा करती है:
“संयोग एक प्रकार की दैवी व्यवस्था बन जाता है, जिसका नास्तिकता की आड़ में नाम तो नहीं लिया जाता, लेकिन गुप्त रूप से जिसकी पूजा की जाती है।” पियेर-पी. ग्रासे, फ़्रांसीसी विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष, इवोल्यूशन ऑफ़ लिविंग ऑर्गैनिज़्म्स, पृ. 107।
लेकिन साधारण अवलोकनों और नई वैज्ञानिक खोजों तथा प्रगति से उनके दावे की निरर्थकता आसानी से समझी जा सकती है। एक छोटे-से प्रोटीन का बनना भी किसी तरह संयोग से संभव नहीं। तुर्किये में विकासवाद के प्रबल समर्थकों में से एक, प्रोफ़ेसर अली देमिरसोय स्वीकार करते हैं:
“ जीवन के लिए आवश्यक प्रोटीन साइटोक्रोम-सी का संयोग से बनना उतना ही असंभाव्य है जितना किसी बंदर का टाइपराइटर पर मानवता के इतिहास की एक किताब बिना किसी ग़लती के लिख देना।” अली देमिरसोय, कालितिम वे एव्रिम (आनुवंशिकता और विकास), अंकारा: मेतेक्सान यायिनलारी, 1984, पृ. 64।
प्रसिद्ध ब्रिटिश गणितज्ञ और खगोलशास्त्री फ़्रेड हॉयल कहते हैं:
“इस तरह जीवन के अधिक जटिल रूपों के उत्पन्न होने की संभावना उस संभावना जैसी है कि कबाड़खाने से गुज़रता कोई बवंडर वहाँ मौजूद सामान से एक बोइंग 747 विमान जोड़ दे।” “हॉयल ऐंड इवोल्यूशन”, नेचर, खंड 294, 12 नवंबर 1981, पृ. 105।
जो संयोग एक छोटे-से प्रोटीन की उत्पत्ति भी नहीं समझा सकता, वह जीवित अंगों की चकित कर देने वाली जटिलता, आँख और मस्तिष्क के तंत्रों में दिखाई देने वाली उत्कृष्ट हिकमत, हमारे ब्रह्मांड को चलाने वाली अद्भुत व्यवस्था या लाखों विविध जीवों के अस्तित्व की व्याख्या भी नहीं कर सकता। हर जीव अपने आप में रचना का एक आश्चर्यजनक उदाहरण है…
हॉयल के अनुसार संयोग को पूर्ण सामर्थ्य और असीम हिकमत देने का यह आग्रह वैज्ञानिक कारणों से नहीं, दूसरे कारणों से पैदा होता है:
“ वास्तव में, यह सिद्धांत कि जीवन की संरचना किसी बुद्धिमत्ता ने बनाई है, इतना स्पष्ट है कि आश्चर्य होता है कि इसे व्यापक रूप से स्वतः स्पष्ट सत्य क्यों नहीं माना जाता। इसके कारण वैज्ञानिक से अधिक मनोवैज्ञानिक हैं।” फ़्रेड हॉयल और चंद्र विक्रमसिंघे, इवोल्यूशन फ़्रॉम स्पेस, न्यूयॉर्क: साइमन ऐंड शूस्टर, 1984, पृ. 130।
और समय का क्या…
नास्तिक अक्सर समय का भी भ्रामक सहारा लेते हैं। वे “बहुत लंबी अवधि में सब कुछ संभव हो जाता है” या “अरबों-अरब वर्षों में…” जैसे अस्पष्ट दावे करते हैं। इस तरह वे लोगों को यह विश्वास दिलाकर भ्रमित करना चाहते हैं कि समय का कोई जादुई प्रभाव उनके सिद्धांतों को हर कठिनाई से निकाल देगा। मसलन, उनमें से कोई कहता है: “मुझे समय और पानी दीजिए, मैं जीवन पैदा कर दूँगा…” ऐसा पूरी तरह अतार्किक दावा करते हुए वह अच्छी तरह जानता है कि लाखों वर्षों बाद उसके प्रयोग की सफलता जाँचने के लिए कोई मौजूद नहीं होगा। वह संयोग पर आधारित प्रक्रिया से जीवन की उत्पत्ति को बिल्कुल स्पष्ट नहीं करता, बल्कि समस्या को एक बंद रास्ते में ले जाकर उससे बचना चाहता है। वह केवल समय को ऐसा जादुई कारक बना देता है जो सब कुछ संभव कर देगा।
इस दावे को अलग-अलग दृष्टिकोणों से साधारण ढंग से परखना ही उस झाँसे को पहचानने के लिए काफ़ी है जो लोगों के मन में डाला जा रहा है:
पहली बात, ब्रह्मांड की जटिलता समय द्वारा संभव परिवर्तनों से कहीं आगे है। अरबों-अरब वर्षों में भी जीवों के संयोग से बनने की असंभाव्यता बनी रहती है। प्रोटीन का साधारण उदाहरण इसे दिखाने के लिए पर्याप्त है। जीवन की उत्पत्ति के बारे में नास्तिक समुदाय द्वारा समर्थित विकासवादी दावा इस तरह है: “आदिम धरती के वातावरण में कुछ अमीनो अम्ल एकत्र होकर एक प्रोटीन बन गए। इसी तरह कई प्रोटीन बने और फिर इन प्रोटीनों ने मिलकर पहली जीवित कोशिका बनाई…” लेकिन यह सिद्ध किया गया है कि 500 अमीनो अम्लों से बने एक औसत प्रोटीन के बनने की संभावना 1/(10 950) है। दूसरे शब्दों में, एक औसत प्रोटीन के बनने की संभावना है: एक अरब गुणा एक अरब गुणा एक अरब गुणा एक अरब गुणा एक अरब गुणा एक अरब… गुणा एक अरब में एक।
यह संभावना इतनी छोटी है कि कितना भी समय बीते, वह लगभग वैसी ही रहती है। मान लें कि सौ अरब वर्षों तक—जबकि ब्रह्मांड की उम्र केवल 13 अरब वर्ष आँकी जाती है—सौ अरब ग्रहों पर हर सेकंड एक अभिक्रिया हुई हो। एक वर्ष में लगभग 3 करोड़ 20 लाख सेकंड मानें। साधारण गणना से कुल अभिक्रियाएँ लगभग होंगी: 100 अरब × 100 अरब × 3 करोड़ 20 लाख = 32 × 104× 109 ×10×9 = 32×1022 जिसे बढ़ाकर हम 1024मान लेते हैं।
यह 1024 प्रोटीन बनने की संभावना पर कितना असर डालेगा? व्यावहारिक रूप से कोई असर नहीं; संभावना बढ़कर केवल (1/10926) होगी। संक्षेप में: सौ अरब वर्ष और सौ अरब ग्रह मान लेने पर भी एक छोटे-से प्रोटीन के बनने की संभावना शून्य ही रहती है ।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक विलियम स्टोक्स अपनी किताब एसेंशियल्स ऑफ़ अर्थ हिस्ट्री में यह स्वीकार करते हैं। वे लिखते हैं कि यह संभावना इतनी छोटी है “कि अरबों वर्षों में अरबों ग्रहों पर भी वह प्रोटीन नहीं बन सकता, भले ही हर ग्रह आवश्यक अमीनो अम्लों के गाढ़े तरल घोल की परत से ढका हो”।
ध्यान रहे कि यहाँ केवल एक प्रोटीन की बात हो रही है; मानव शरीर में लाखों प्रोटीन हैं। इसके अलावा धरती पर ऐसी कोई कोशिश और भूल सुधारने वाली व्यवस्था नहीं है जो बार-बार परीक्षण करके प्रोटीन बनाती रहे।
दूसरी बात, विकासवादियों के दावों के विपरीत समय व्यवस्था बनाने के बजाय किसी व्यवस्था के विघटन और उसकी सूचना के नष्ट होने का कारण बनता है। छोड़ दी गई कार समय के साथ कभी अधिक विकसित मॉडल नहीं बन जाएगी। उलटे उसकी बॉडी में जंग लगेगा, रंग उखड़ जाएगा, शीशे टूट जाएँगे और कुछ ही समय में वह कबाड़ का ढेर बन जाएगी। कार्बनिक अणुओं और जीवों में यही अपरिहार्य प्रक्रिया और तेज़ी से होती है। यह ऊष्मागतिकी का एक साधारण नियम है: एंट्रॉपी का नियम, जिसके अनुसार “प्राकृतिक परिस्थितियों में अपने हाल पर छोड़ी गई हर व्यवस्था समय के साथ अव्यवस्था, बिखराव और अंततः विघटन की ओर बढ़ती है।”
हमारे ब्रह्मांड को संचालित करने वाले नियम निश्चित और स्थिर हैं। समय बीतने से वे बदलते नहीं। मेंढक का बच्चा मेंढक ही होगा और छिपकली का बच्चा छिपकली ही रहेगा, क्योंकि जो आनुवंशिक सूचना आगे जाती है वह छिपकली की होती है, और प्राकृतिक कारण कभी उसमें नई सूचना नहीं जोड़ेंगे।
दूसरी ओर समय कई बार सृष्टि के प्रमाण के रूप में सामने आता है। ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड विश्वविद्यालय के गणितीय भौतिकी के प्रोफ़ेसर पॉल डेविस ने बिग बैंग के समय आवश्यक परिस्थितियों की गणना की और एक आश्चर्यजनक नतीजे पर पहुँचे। उनके अनुसार यदि प्रसार की दर में 10−18 सेकंड, यानी एक सेकंड के एक क्विंटिलियनवें हिस्से से अधिक अंतर होता, तो ब्रह्मांड बन नहीं सकता था:
“सृष्टि के समय, जब प्रसार की दर दृढ़ता से निर्धारित हुई थी, यदि यह दर अपने वर्तमान मान से 10−18से अधिक भिन्न होती, तो इतने भर से यह सूक्ष्म संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता। ब्रह्मांड के विस्फोट की अविश्वसनीय सटीकता ने उसके गुरुत्वाकर्षण बल को प्रकट होने दिया। इसलिए बिग बैंग अद्भुत रूप से व्यवस्थित परिमाण वाला विस्फोट था।” पॉल डेविस, सुपरफ़ोर्स: द सर्च फ़ॉर अ ग्रैंड यूनिफ़ाइड थ्योरी ऑफ़ नेचर, 1984, पृ. 184।
अंत में
अब तक की चर्चा हमें उस त्रुटिहीन योजना के सामने ला खड़ा करती है जो हर ओर दिखाई देती है। जो व्यक्ति बुद्धि और अंतःकरण से इन स्पष्ट और निर्विवाद निशानियों को परखना चाहेगा, उसे इनमें सृष्टिकर्ता के अस्तित्व के उज्ज्वल प्रमाण दिखेंगे। ब्रह्मांड में
संयोग के लिए कोई जगह नहीं है। इस पूर्ण व्यवस्था का सृष्टिकर्ता अल्लाह है। उसी के पास असीम सामर्थ्य
और ज्ञान है। इस सांसारिक जीवन में हमारा कर्तव्य है कि हम अपने सृष्टिकर्ता को पहचानें, उससे प्रेम करें, उससे डरें और उसके आदेश के अनुसार उसकी इबादत करें:
ऐ लोगो! अपने[1] उस पालनहार से डरो, जिसने तुम्हें एक जीव (आदम) से पैदा किया तथा उसी से उसके जोड़े (हव्वा) को पैदा किया और उन दोनों से बहुत-से नर-नारी फैला दिए। उस अल्लाह से डरो, जिसके माध्यम से तुम एक-दूसरे से माँगते हो, तथा रिश्ते-नाते को तोड़ने से डरो। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारा निरीक्षक है।[1] यहाँ से सामाजिक व्यवस्था का नियम बताया गया है कि विश्व के सभी नर-नारी एक ही माता-पिता से पैदा किए गए हैं। इसलिए सब समान हैं। और सबके साथ अच्छा व्यवहार तथा भाई-चारे की भावना रखनी चाहिए। यह उस अल्लाह का आदेश है जो तुम्हारे मूल का उत्पत्तिकर्ता है। और जिसके नाम से तुम एक-दूसरे से अपना अधिकार माँगते हो कि अल्लाह के लिए मेरी सहायता करो। फिर इस साधारण संबंध के सिवा रिश्तेदारी का संबंध भी है, जिसे जोड़ने पर बहुत बल दिया गया है। एक ह़दीस में है कि रिश्तेदारी को तोड़ने वाला जन्नत में नहीं जाएगा। (सह़ीह़ बुख़ारी : 5984, मुस्लिम : 2555) इस आयत के पश्चात् कई आयतों में इन्हीं अल्लाह के निर्धारित किए मानव अधिकारों का वर्णन किया जा रहा है।क़ुरआन — सूरह النساء (4:1)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5