एपिसोड 23 – विकासवाद का प्रमाण खोजने की असफल यात्रा
जीवाश्मों, अवशेषी अंगों, डीएनए, शारीरिक और भ्रूणीय समानताओं पर लेखक की आलोचना पढ़ें। जानिए वे विकासवाद के कथित प्रमाणों की जाँच कैसे करते हैं।
अस्सलामु अलैकुम। आइए भाइयो, मैं उन लोगों की कहानी सुनाऊँ जो किसी भी तरह अपने असत्य को सिद्ध करना चाहते हैं। वे एक असफलता से दूसरी में जाते हुए कितने दयनीय दिखते हैं और सत्य उनका पीछा करता है। पर घबराइए नहीं; हम उनके साथ निराश नहीं होंगे, क्योंकि उनकी कहानी में बहुत हास्य है। हमारे साथ चलिए।
पिछले दो एपिसोडों में हमने देखा कि डार्विन ने अपने मिथक की बुनियाद ढहते हुए किनारे पर रखी और उसके समर्थकों ने उस पर निर्माण किया, तो वे बुद्धि और विज्ञान से और अधिक टकराव में गिर पड़े। यह सुधारी गई गलतियों और भरी गई कमियों का मामला नहीं, बल्कि फैलाए गए छेदों का मामला है; और बकरी है, चाहे उड़ जाए। सैद्धांतिक संशोधनों ने मिथक और खोजों से टकराव ही बढ़ाया।
वे कहते हैं कि इस सिद्धांत के प्रमाण हैं और डार्विन के बाद वाले लोग और प्रमाण इकट्ठा करते आए। आइए इन कथित प्रमाणों के समूह देखें।
विकासवाद के कथित प्रमाण
पहला प्रमाण: जीवाश्म (Fossils)
डार्विन के अनुसार जीवित प्राणी धीरे-धीरे एक साझा मूल या कुछ थोड़े मूलों से विकसित हुए। इसलिए हमें यह क्रम वास्तविक संसार में दिखना चाहिए। लेकिन वास्तव में उनके बीच बड़ा भेद, विशाल खाइयाँ और अलगाव की सीमाएँ मिलती हैं। उदाहरण के लिए सरीसृपों और पक्षियों के बीच संक्रमणीय प्राणी कहाँ हैं? वे वास्तविक संसार में नहीं हैं।
डार्विन ने माना कि यह उसकी कल्पना के विरुद्ध है, इसलिए उसने कल्पना की कि यह क्रम और संक्रमणीय प्राणी अतीत में थे। तब उनके जीवाश्म और पत्थर बने शरीर धरती के नीचे मिलने चाहिए। धरती की सतह छोड़कर नीचे भागने का कोई कारण नहीं, फिर भी आइए डार्विन के साथ नीचे उतरें।
डार्विन ने सोचा कि हमें क्या मिलेगा? धरती की गहरी परतों में सरल रचना वाले आदिम जीवों के जीवाश्म। ऊपर की परतों की ओर बढ़ने पर अधिक जटिल विलुप्त जीव मिलेंगे, जो संक्रमण के चरण होंगे। फिर और ऊपरी परतों में उन जीवों के जीवाश्म मिलेंगे जो आज हमारे बीच मौजूद हैं।
डार्विन ने अपनी पुस्तकों में ये कल्पनाएँ उकेरीं और भविष्यवाणी की कि असंख्य विलुप्त संक्रमणीय जीव धरती की परतों में दबे होने चाहिए। यानी यहाँ जीवन शुरू करने वाला सरल जीव है, जो गहरी परतों में मिलेगा। इस रेखा का हर बिंदु विलुप्त जीव है: यहाँ एक जीव, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और इसी तरह आगे। फिर डायनासोर जैसा विकसित जीव है, जो बहुत पहले विलुप्त हुआ, इसलिए बहुत गहरी परतों में मिलेगा। डायनासोर और पक्षियों के बीच असंख्य संक्रमणीय जीव मिलेंगे, फिर ऊपरी परतों में आज हमारे बीच मौजूद जीव दिखेंगे—और इसी तरह आगे।
ये डार्विन के सपने थे, जिन्हें वह अपने सिद्धांत की सत्यता के लिए देखना चाहता था। वास्तव में उसे क्या मिला? हर वह चीज़ जो उसके सपनों को तोड़ती थी।
पहला: बहुत जटिल जीव अचानक धरती की गहरी कैम्ब्रियन परत में प्रकट हुए, इसलिए इस घटना को कैम्ब्रियन विस्फोट (Cambrian Explosion) नाम दिया गया। डार्विन की कल्पना जैसा इनसे सरल साझा पूर्वज नहीं मिला। न ये विलुप्त हुए, न अधिक जटिल जीवों में विकसित हुए, बल्कि आज तक वैसे ही हैं। कैम्ब्रियन जीवों की जटिलता समझने के लिए ट्राइलोबाइट (Trilobite) के जीवाश्म की आँख देखें: सैकड़ों छोटी जटिल आँखों से बनी, जो मिलकर काम करती हैं। वह आज तक वैसी ही है।
दूसरा: डार्विन ने पाया कि संक्रमणीय जीव उनके मिथक की माँग के अनुसार “असंख्य” नहीं थे, बल्कि मौजूद ही नहीं थे। सभी प्रमाण डार्विन के रेखाचित्रों के विरुद्ध थे। क्या वे इससे अनजान थे? नहीं। शायद कुछ लोग समझें कि ये खोजें डार्विन के बाद हुईं, जबकि वे उनके समय की थीं। उन्होंने कैम्ब्रियन जीवों पर विस्तार से लिखा। संक्रमणीय जीवों के अभाव पर भी पूछा: “जब इस सिद्धांत के अनुसार अतीत में असंख्य संक्रमणीय रूप रहे होने चाहिए, तो वे धरती की परतों में असंख्य संख्या में दबे क्यों नहीं मिलते?”
बहुत अच्छा! तो क्या आप सपनों से जाग गए, डार्विन? नहीं! मिथक चलते रहना चाहिए। वे इन स्वीकारोक्तियों का शीर्षक रख सकते थे: “धरती के ऊपर की चीज़ों की तरह जीवाश्म अभिलेख ने भी मेरे सपने तोड़ दिए।” मगर पुस्तक में शीर्षक दिया: “जीवाश्म अभिलेख की अपूर्णता” (On the imperfection of the fossil record)। अपूर्णता? अब अगर कोई जीवाश्म मिले तो क्या बुद्धि नहीं कहती कि उसे स्थापित स्पष्ट तथ्यों के प्रकाश में समझें? नहीं! मानो डार्विन बाद वालों से कह रहे हों: “ऐसी कोई चीज़ खोजो जिसकी अनेक व्याख्याएँ संभव हों, ताकि उससे इन स्पष्ट तथ्यों पर चोट करो। कोई तिनका लाओ जिससे लोगों की आँखों से सूरज का प्रकाश छिपा दें।”
वास्तव में डार्विन के वफ़ादार सैनिक उनके बाद कथित संक्रमणीय जीव खोजने निकले। उन्होंने अनदेखा किया कि गुरु के मिथक के अनुसार असंख्य जीव चाहिए। वे कहीं से एक उड़ती बकरी ही खोजकर उसका सहारा लेना चाहते थे। वे एक असफलता से दूसरी में गए। जब भी संक्रमणीय जीव मिलने का दावा किया, शोध ने दिखाया कि वह हास्यास्पद ढंग से जालसाज़ी, झूठ या ग़लत व्याख्या थी: उड़ते डायनासोर आर्कियोरैप्टर (Archaeoraptor), आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx), सीलाकैंथ मछली, टिकटालिक, पिल्टडाउन मनुष्य की खोपड़ी (Pilldown), जावा मनुष्य की हड्डियाँ, फिर लूसी का जीवाश्म (Lucy), उसकी मित्र इडा का जीवाश्म (Ida), और आर्डी का जीवाश्म (Ardipithecus), तथा बहुत कुछ।
मानो वे कहते हों: अल्लाह की ओर संकेत करते ब्रह्मांड के प्रमाण न सुनो और उन पर शोर करो ताकि जीत जाओ। इन सबका, और अन्य का भी, जैसा हम विस्तार से दिखाएँगे, एक-एक करके झूठ, जानबूझकर की गई धोखाधड़ी या अर्थ-विकृति होना सामने आया; पर हर झूठ कुछ समय तक मिथक को जीवित करने के लिए प्रयोग हुआ।
इस दयनीय दृश्य और असफलता की कहानियों से आप उदास न हों, भाइयो; आइए डार्विन के मिथक-धारावाहिक के नायकों द्वारा किए गए कुछ हास्य दृश्य देखें।
वर्ष 1922 में मिथक के प्रेमियों को अमेरिका के नेब्रास्का में दाढ़ मिली। जी हाँ, एक दाढ़! उसे विकासवाद का बड़ा प्रमाण माना और उसके आधार पर लगभग मानव जैसे जीव का चित्र बनाया। कहा, वह 60 लाख वर्ष पहले रहता था। उसे “वैज्ञानिक नाम” दिया। प्रसिद्ध “साइंस” (Science) पत्रिका ने इस महान खोज पर समीक्षित शोधपत्र प्रकाशित किया। लेकिन पाँच वर्ष बाद पता चला कि दाँत सूअर का था! उसी साइंस पत्रिका ने पिछले लेख का खंडन प्रकाशित किया।
फिर 1979 में मिथक के प्रेमियों को एक हड्डी मिली। बोले: “प्रमाण मिल गया! यह दूर अतीत में रहने वाले मानव जैसे जीव की हंसली है।” फिर पता चला कि वह डॉल्फ़िन की पसली का हिस्सा था, जैसा चार साल बाद “न्यू साइंटिस्ट” (New Scientist) ने प्रकाशित किया।
वर्ष 1982 में मिथक-प्रेमी तीन वैज्ञानिकों को खोपड़ी का टुकड़ा मिला। वे ख़ुशी से उछल पड़े: “आख़िर प्रमाण मिल गया!” उस हिस्से पर मानव जैसे जीव का चित्र बनाया और कहा कि उसकी मृत्यु 17 वर्ष की आयु में हुई थी। अनुमान दिया कि वह नौ लाख से सोलह लाख वर्ष पहले रहता था। उसे “ऑर्स मनुष्य” (Orce Man) नाम दिया और कथित विकास की सीढ़ी में जगह तय की। खोज को “सदी की खोज” कहा गया! बड़े व्यक्तियों की उपस्थिति में प्रेस सम्मेलन हुआ, जश्न और ख़ुशियाँ छा गईं। लेकिन ख़ुशी अधूरी रह गई! बाद में पता चला कि वह गधे के बच्चे की खोपड़ी थी। वे व्यंग्य-पत्रिकाओं में हँसी का पात्र बन गए।
इस तरह मिथक के प्रेमी मैदानों, पहाड़ों, कूड़ाघरों और कब्रिस्तानों में अपने मूल को हर उस चीज़ में खोजते हैं जिस पर उनके पैर पड़ते हैं: सूअर की दाढ़ों, डॉल्फ़िन की पसलियों और गधों की खोपड़ियों में; ऐसे मतिभ्रमग्रस्त दिवालिये की तरह जो थूक को सिक्का समझे। यह सब मिथक के लिए है। यही जीवाश्म-प्रमाण की कहानी का संक्षेप है। याद रखिए, भाइयो, यह एपिसोड आने वाले एपिसोडों में विस्तार से बताई जाने वाली बातों का त्वरित अवलोकन है।
दूसरा प्रमाण: बेकार अंगों में संयोग के निशान!
डार्विन ने “प्रजातियों की उत्पत्ति” के बाद प्रकाशित “मनुष्य का उद्भव” में मानव शरीर के कई क्षीण, अनुपयोगी अंग विकासवाद के प्रमाण के तौर पर गिनाए। उन्हें “अवशेषी अंग” (Vestigial organs) कहा। उनका तर्क था: इंसान संयोगों का परिणाम है तो संयोग ने अपने परिणाम में निशान छोड़े होंगे—विकास के अवशेष, पशु-पूर्वजों के ऐसे चिह्न जिनका अब मानव शरीर में कोई काम नहीं। मानो उन्होंने दरवाज़ा खोला और समर्थक धक्कमधक्का करते घुस आए। मानव शरीर को हिस्सा-दर-हिस्सा टटोलकर क्या ढूँढ़ने लगे? ग़लतियाँ!
यहाँ तक कि जर्मन डार्विनवादी शरीर-रचना विज्ञानी रॉबर्ट वीडर्सहाइम (Robert Wiedersheim) ने 1893 में मानव शरीर के 86 अनुपयोगी अवशेषी अंगों की सूची दी। भाई, समझिए उनकी अज्ञानता कितनी थी कि वे उपहास बने। सूची में पीयूष (Pituitary Gland) और पीनियल (Pineal Gland) जैसी अंतःस्रावी ग्रंथियाँ थीं, क्योंकि उस समय उन्हें अंतःस्रावी ग्रंथियों और हार्मोनों की जानकारी नहीं थी।
उनका तर्क अज्ञान से निष्कर्ष निकालना है: हमें इस अंग का कार्य नहीं पता, अतः इसका कोई कार्य नहीं; अतः यह बिना उद्देश्य की विकासवादी प्रक्रिया से आया होगा। यही तरीका उन्होंने जीवाश्मों में अपनाया। वे स्पष्ट तथ्यों से आँखें मूँदते हैं और शरीर की उत्कृष्टता व सृजनशीलता को छोड़कर किसी भी तिनके को पकड़ते हैं।
फिर भी विज्ञान बढ़ा और इन अंगों के कार्य एक-एक करके सामने आए। न पुच्छ-कशेरुकाएँ बेकार हैं, न अपेंडिक्स अतिरिक्त। पीयूष ग्रंथि अधिकांश हार्मोनों को नियंत्रित करती है; जिन्होंने उसे अंग्रेज़ी में vestigial कहा, वे उसे खो दें तो मर जाएँ। वे फिर दूसरे जीवों में बेकार अंग खोजने लगे, इस धारणा पर कि प्रकृति केवल जीवित रहने के लिए आवश्यक चीज़ रखती है। यह लज्जाजनक तर्क है, क्योंकि वही बात मान लेता है जिसे सिद्ध करना चाहता है। हम ऐसे सृष्टिकर्ता पर विश्वास करते हैं जिसने अपनी सृष्टि में सौंदर्य रखा है; भले कुछ अंग जीवित रहने या प्रजनन में सहायक न हों, वे समझदारों को बताते हैं कि सौंदर्य का एक सृष्टिकर्ता है।
फिर भी वे हर चीज़ में खोजते हैं, यहाँ तक कि ब्रह्मांड के उन भौतिक नियतांकों में भी जो इतनी आश्चर्यजनक सटीकता से तय हैं। मानो कहते हों: “ऐ अंधे संयोग, ब्रह्मांड के किसी कोने में अपना निशान दिखाकर हमारी मदद कर!” अल्लाह की किताब जवाब देती है: “फिर निगाह लौटाओ, क्या तुम्हें कोई दरार दिखती है? फिर निगाह दोबारा-दोबारा लौटाओ; तुम्हारी निगाह हारकर और थककर तुम्हारी ओर लौट आएगी।” [अल-मुल्क 67:3–4] तो जितना चाहो दोष खोजो!
धरती के ऊपर और नीचे असफल हुए तो आनुवंशिक पदार्थ में खोजने लगे कि शायद मनचाही चीज़ मिले। व्यक्तिगत रूप से, अल्लाह की महानता की ओर मुझे सबसे अधिक ले जाने वाली बातों में आनुवंशिक पदार्थ और केंद्रक के संसार के अद्भुत तंत्रों पर चिंतन है। लेकिन ब्रह्मांड की निशानियाँ भी क़ुरआन की आयतों जैसी हैं: “जो ईमान लाए, उनका ईमान उसने बढ़ा दिया और वे ख़ुश होते हैं। लेकिन जिनके दिलों में रोग है, उनकी गंदगी पर और गंदगी बढ़ा दी।” [अत-तौबा 9:124–125]
तीसरा प्रमाण: आनुवंशिक पदार्थ (DNA)
मिथक के प्रेमियों ने कहा: मिल गया! आनुवंशिक पदार्थ (DNA) का केवल थोड़ा भाग कार्यरत जीन है, जबकि अधिकतर "Junk" अर्थात बेकार कचरा है, यादृच्छिक विकास के अवशेष। यदि मनुष्य को बनाने वाला सृष्टिकर्ता है तो वह उसमें कचरा DNA क्यों रखेगा?
फिर जिस डीएनए को “कबाड़” कहा, उसके बहुत-से अनिवार्य कार्य मिले। वह ख़ज़ानों का स्रोत निकला—जैसा एन्कोड परियोजना के प्रमुख प्रोफ़ेसर इवान बर्नी (Ewan Birney) ने कहा; उसमें 400 आनुवंशिकीविद् शामिल थे। स्पष्ट हुआ कि असली “कबाड़” डार्विनवादियों की समझ और अल्लाह की सुदृढ़ रचना के प्रति उनका रवैया है। तो डॉकिन्स आपसे कहते हैं: “बिल्कुल नहीं, डार्विनवाद को ठीक इसी की उम्मीद थी!” मिथक बचाने के लिए कैसा हठ!
आने वाले एपिसोडों में, यदि अल्लाह ने चाहा, हम आनुवंशिक पदार्थ के बारे में उनके झूठे दावों का विवरण देंगे: मनुष्य और चिंपैंज़ी के आनुवंशिक पदार्थ की समानता का प्रतिशत और दो क्रोमोसोमों के जुड़ने का झूठ; ताकि जानें कि इन लोगों ने मिथक के लिए विज्ञान, बुद्धि और स्वयं अपने साथ कैसे बुरा किया।
चौथा प्रमाण: रूपात्मक समानता
चौथा प्रमाण, भाइयो, जिस पर डार्विन ने बहुत भरोसा किया: कुछ जीवों के बाहरी रूप की आकृतिक समानताएँ और शरीर-रचना की समानताएँ। समानता को साझा उत्पत्ति का प्रमाण मानना न वैज्ञानिक आधार है, न तार्किक। इसकी कथित प्रमाणिकता का खंडन करने के लिए अपरा वाले स्तनधारियों और उनसे मिलते-जुलते थैलीधारी जीवों की प्रबल समानताएँ पर्याप्त हैं।
अपरा वाले जीव का भ्रूण गर्भाशय की अपरा में अपना विकास पूरा करता है। थैलीधारी जीव, जैसे कंगारू, थैली में विकास पूरा करता है। डार्विनवादियों के अनुसार थैलीधारी बहुत पहले अपरा वाले जीवों से अलग हुए, जिससे दोनों के गर्भधारण, दूध पिलाने और भीतरी शारीरिक तंत्रों में बहुत अंतर आ गया। इसलिए विकासवादी शाखाओं, वर्गीकरण और संबंध-वृक्ष में अपरा वाली गिलहरी व्हेल, हाथी, हिरन और सभी ज्ञात अपरा वाले स्तनधारियों से अपने थैलीधारी समकक्ष की तुलना में अधिक निकट है। थैलीधारी गिलहरी भी अपने जैसी दिखने वाली अपरा वाली गिलहरी से अधिक कंगारू और कोआला के निकट है। यही बात भेड़ियों, छछूँदरों, वॉम्बैटों और उनके अपरा वाले तथा थैलीधारी समकक्षों और बहुत-से अन्य जीवों के लिए समझें।
इसका अर्थ क्या है? रूपात्मक या बाहरी समानता और शरीररचनात्मक निकटता का विकासवादी अर्थ नहीं। आकार में समान पशु अपने शरीर-तंत्र और गर्भधारण में बहुत भिन्न हैं, और शरीर-क्रिया में समान पशु आकार में बहुत भिन्न हैं।
इस फँसाव से निकलने के लिए डार्विनवादियों ने क्या किया? “अभिसारी विकास” (Convergent Evolution) या “समानांतर विकास” (Parallel Evolution) का मॉडल दिया। भव्य नाम हैं, है न? प्रलाप को नाम दे दिया, तो वैज्ञानिक वैधता भी दे दी! लेकिन ठहरिए, यह तो आपके सिद्धांत की बुनियाद ढहा देता है! नहीं, बस, हमने सिद्धांत बदलकर नया नाम दिया: “नाम दो, जाने दो।” भाइयो, इसे अच्छी तरह याद रखें, क्योंकि यह बार-बार होगा। कोई घटना सिद्धांत ग़लत सिद्ध करे? कोई बात नहीं! सिद्धांत को नया नाम दो, ताकि सुनने वाले को लगे कि आप घटना जानते हैं, उसे कोई ख़तरा नहीं मानते, बल्कि सिद्धांत बदलकर समाधान खोज चुके हैं। सच यह है कि समाधान नहीं मिला, मिथक के लिए नया झूठा नाम गढ़ा गया।
अभिसारी विकास का विचार क्या है? यह हास्यास्पद धारणा है कि जिन यादृच्छिक उत्परिवर्तनों ने प्लेसेंटल जीव बनाए, वही संयोग और विवरणों के साथ फिर दोहराए गए और उसी मार्ग, क्रम तथा संगठन से मार्सुपियल जीव बना दिए, जबकि उनकी संख्या असंख्य है। कोई टिप्पणी नहीं।
जब वे कहते हैं, “आधुनिक खोजें चुनौतियाँ हैं जिन्हें सिद्धांत का सामान्य ढाँचा तोड़े बिना संशोधन करके समेटा और समझाया जा सकता है”, तो ऐसे ही संशोधनों की बात होती है। मिथक की सुई के छेद में संशोधन, ताकि उसमें विशाल ब्रह्मांड घुसाया जा सके!
पाँचवाँ प्रमाण: भ्रूणीय समानता
वर्ष 1868 में जर्मन प्राणीविज्ञानी अर्न्स्ट हैकेल (Ernst Haeckel) ने मानव और अन्य जीवों के भ्रूणों के चित्र छापने शुरू किए। उनका दावा था कि वे सूक्ष्मदर्शी से देखे गए हैं। उन्होंने उनमें बड़ी समानता दिखाई और उन चरणों को गर्भावस्था के शुरुआती चरण बताया। डार्विन इस खोज से ख़ुश हुए और “Encyclopaedia Britannica” के अनुसार जर्मनी में विकासवाद फैलाने का श्रेय हैकेल को दिया।
हालाँकि समानता साझा उत्पत्ति हरगिज़ सिद्ध नहीं करती, झूठ की उम्र भी छोटी है। सूक्ष्मदर्शी केवल हैकेल के पास नहीं था। अन्य वैज्ञानिकों ने उनके चित्रों पर संदेह किया और इतना विवाद उठा कि 1909 में “Allegemeine Zeitung” को लिखे पत्र में चित्रों में जालसाज़ी स्वीकार करनी पड़ी। स्वीकार करते हुए भी हैकेल झूठ बोले: उन्होंने कहा कि केवल छह से आठ प्रतिशत चित्र गढ़े गए और वह भी भ्रूणों के सही, पूर्ण चित्र न मिल पाने के कारण खाली स्थान भरने के लिए।
आश्चर्य है कि हैकेल के बेनक़ाब झूठ को लगभग डेढ़ सदी गुज़र गई, फिर भी बिना थके, बिना ऊबे और ज़रा भी शर्म के वही झूठ हज़ारों स्कूली, विश्वविद्यालयी और वैज्ञानिक पुस्तकों में जस का तस दोहराया जाता है। अंग्रेज़ी संदर्भों के नाम: “Biology by Raven and Johnson”, “Biology by Starr and Taggart”, “Evolutionary Biology by Futuyma” और बहुत-से अन्य।
ख़ुद डार्विनवादी स्टीफ़न गूल्ड (Stephen Gould) ने अपनी पुस्तक “Natural History” में कहा: “एक सदी की मूर्खतापूर्ण पुनरावृत्ति पर हमें हैरान और शर्मिंदा होना चाहिए, जिसके कारण ये चित्र बहुत-सी, शायद अधिकांश आधुनिक पुस्तकों में बने रहे।”
भाइयो, ये वही पुस्तकें और संदर्भ हैं जिनके संस्करण जानकारी अद्यतन करने के लिए हर वर्ष या दो वर्ष में निकलते हैं। हमारे पाठ्यक्रमों में, उदाहरण के लिए, (2015) की उपचार Guidelines पढ़ाना जबकि (2018) में नई Guidelines आ चुकी हों, विज्ञान के साथ विश्वासघात माना जाएगा। फिर भी वे मिथक के लिए उस झूठ से चिपके हैं जिसकी दुर्गंध बहुत पहले फैल चुकी है।
हम पूछ सकते हैं: अगर विकासवाद सचमुच जीवन का रहस्य है, तो समर्थकों को उसके लिए झूठ और उसी झूठ को बार-बार दोहराने के अलावा कुछ क्यों नहीं मिलता? वे नाज़ी प्रचार मंत्री जोज़ेफ़ गोएबेल्स (Joseph Goebbels) के इस कथन को क्यों अपनाते हैं: “झूठ बोलो, फिर झूठ बोलो, फिर झूठ बोलो, जब तक लोग तुम्हें मान न लें। फिर और झूठ बोलो, जब तक तुम ख़ुद मान न लो”?
जब कुछ मुसलमान दुर्भाग्य से तोते की तरह कहते हैं कि विकासवाद के हजारों प्रमाण हैं, तो वे ऐसे प्रमाणों की ही बात करते हैं। किंतु वैज्ञानिक ईमानदारी के लिए एक खोज-क्षेत्र बताना शेष है जो वास्तव में डार्विनवाद के अनुकूल है: Photoshop और हॉलीवुड की सिनेमाई छायांकन की खोजें। डार्विनवादी उनका सहारा वैसे लेते हैं जैसे असफल व्यक्ति अपने काल्पनिक संसार में रहने के लिए मतिभ्रमकारी दवाओं का लेता है; कुछ हड्डियों के ऊपर मांस, आँखें, बाल और चेहरे की झुर्रियों वाला पूरा प्राणी बुनते हैं, फिर मीडिया और पाठ्यक्रमों में मिथक को सामान्य बनाते हैं ताकि वह ऐतिहासिक तथ्य लगे।
उस युवक की कल्पना करें जो किसी ख़ास गुणों वाली लड़की ढूँढ़ता है, लेकिन मिलती नहीं। वर्षों की खोज के बाद घर लौटकर सपनों की लड़की का चित्र बनाता है और आहें भरते हुए उससे प्रेम की बातें करता है। इन लोगों का काम और कठिन है, क्योंकि उनकी सपनों की लड़की उड़ती बकरी है। जब ब्रह्मांड की हर चीज़ ने उनके मुँह पर चिल्लाया, “नाकाम लोगो!”, तो उन्होंने फ़ोटोशॉप का सहारा लिया। डार्विन की मेज़ के गिरे पायों को सहारा नहीं दे पाए, जिस पर उन्होंने सभी जीवित प्राणियों का भारी बोझ लादा था। तब मेज़ पर रखे ब्रह्मांड के अवलोकनों को पायों में बदलकर सहारा देने की व्यर्थ कोशिश की। मगर सही विज्ञान हर बार उनके हाथ झुलसाकर कहता है: “कोशिश मत करो, नाकाम लोगो! ये अवलोकन तुम्हारे विरुद्ध हैं, पक्ष में नहीं।”
आप कह सकते हैं, भाई, यदि विकासवाद का मिथक इस तरह उस स्पष्ट ब्रह्मांडीय सत्य के सामने असफल है कि जीवित प्राणियों का एक सर्वज्ञ सृष्टिकर्ता है, तो बहुत लोग उस पर विश्वास क्यों करते हैं? यही हमारे अगले एपिसोडों का विषय है। याद रखिए कि विकासवाद का मिथक एक बड़े विषय का नमूना है: झूठे विज्ञान के पुजारी स्पष्ट सत्यों के विरुद्ध विश्वास को चोट पहुँचाने और लोगों को सबसे हास्यास्पद मिथकों पर राज़ी करने के लिए मनों को कैसे धोते हैं। हमारे साथ बने रहिए, भाइयो। अस्सलामु अलैकुम।