रूह के अस्तित्व के प्रमाण
चेतना, व्यक्तिगत पहचान, मस्तिष्क और नींद के अनुभव पर विचार करें: यह लेख रूह के अस्तित्व का तर्क और मानव ज्ञान की सीमाएँ प्रस्तुत करता है।
हमारी व्यक्तिगत पहचान
बहुत से भौतिकवादी मानव रूह के अस्तित्व को नकारते हैं। उनका दावा है कि मनुष्य केवल पदार्थ का ढेर है और चेतना, विवेक तथा बुद्धि का स्रोत केवल मस्तिष्क की “रासायनिक अभिक्रियाएँ” हैं। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक अवलोकन और खोजें इस दावे को पूरी तरह उलट देते हैं। विज्ञान ने सिद्ध किया है कि मानव चेतना को केवल पदार्थ तक सीमित नहीं किया जा सकता और न मस्तिष्क के कार्यों से समझाया जा सकता है। आज अनेक शोधकर्ता मानते हैं कि चेतना का स्रोत मस्तिष्क के न्यूरॉनों और उन्हें बनाने वाले अचेतन परमाणुओं से परे कोई अज्ञात तत्व है।
अपनी किताब “मन का रहस्य” में कनाडा के तंत्रिका-शल्यचिकित्सक वाइल्डर पेनफ़ील्ड
![]() वाइल्डर पेनफ़ील्ड |
यह निष्कर्ष देते हैं:
“वर्षों तक केवल मस्तिष्क की क्रियाओं के आधार पर मन को समझाने की कोशिश के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि यह परिकल्पना अपनाना अधिक सरल और तार्किक है कि हमारा अस्तित्व दो मूल तत्वों—मस्तिष्क और मन [या रूह]—से बना है। यह निश्चित है कि मस्तिष्क की तंत्रिकीय क्रियाओं से चेतना समझाना हमेशा असंभव रहेगा… मैं यह परिकल्पना चुनने को विवश हूँ कि हमारा अस्तित्व दो मूल तत्वों पर आधारित है।” वाइल्डर पेनफ़ील्ड, द मिस्ट्री ऑफ़ द माइंड: अ क्रिटिकल स्टडी ऑफ़ कॉन्शसनेस ऐंड द ह्यूमन ब्रेन, प्रिन्सटन, न्यू जर्सी: प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 1975, पृ. 80।
दो अन्य स्पष्ट बातें इस निष्कर्ष को सहारा देती हैं। पहली, मानव मस्तिष्क की सभी कोशिकाएँ नियमित रूप से नष्ट होती हैं और उनकी जगह नई आती हैं। भौतिकवादी परिकल्पना के अनुसार हमारी सारी स्मृतियाँ, विचार और पहचान सात वर्षों में मिट जानी चाहिए, क्योंकि शरीर की सभी कोशिकाएँ अधिकतम हर सात वर्ष में बदल जाती हैं। लेकिन मनुष्य जीवन भर अपनी स्मृतियाँ और पहचान रखता है, जो भौतिकवादी परिकल्पना को पूरी तरह नकारता है। दूसरी, मानव मस्तिष्क और एक ईंट लें। मस्तिष्क का हर इलेक्ट्रॉन ईंट के इलेक्ट्रॉन से बदल दें और ईंट का इलेक्ट्रॉन मस्तिष्क में रख दें, तो क्या होगा? क्या ईंट चेतन हो जाएगी? क्या मनुष्य चेतना खो देगा? उत्तर स्पष्ट है: ईंट कभी चेतन नहीं होगी। चेतना अचेतन परमाणुओं या इलेक्ट्रॉनों से नहीं, बल्कि ऐसी चेतन रूह से आती है जो अनुभव करती, सोचती और निर्णय लेती है।
प्रसिद्ध ब्रिटिश भौतिकविद रॉजर पेनरोज़ अपनी किताब द एम्परर्स न्यू माइंड में समझाते हैं:
“किसी विशेष व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत पहचान क्या देता है? क्या शरीर बनाने वाले परमाणु? क्या उसकी पहचान इलेक्ट्रॉनों, प्रोटॉनों और अन्य परमाण्विक कणों के किसी विशेष चयन पर निर्भर है? इसके ग़लत होने के कम से कम दो कारण हैं। पहला, हर जीवित शरीर के
![]() ![]() क्या हमारी व्यक्तिगत पहचान शरीर बनाने वाले परमाणुओं पर निर्भर है? रॉजर पेनरोज़ यह प्रश्न उठाते हैं। |
पदार्थ में निरंतर परिवर्तन होता है। यह विशेष रूप से मस्तिष्क की कोशिकाओं पर लागू है। जन्म के बाद नई कोशिकाएँ न बनने पर भी हर जीवित कोशिका, जिसमें मस्तिष्क की हर कोशिका शामिल है, के अधिकतर परमाणु और इस तरह हमारे शरीर का पूरा पदार्थ जन्म के बाद कई बार बदल चुका है।
दूसरा कारण क्वांटम भौतिकी से आता है… यदि किसी मनुष्य के मस्तिष्क के इलेक्ट्रॉन को ईंट के इलेक्ट्रॉन से बदल दिया जाए, तो प्रणाली की अवस्था बिल्कुल पहले जैसी रहेगी। कोई अंतर नहीं होगा। यही बात प्रोटॉन, दूसरे कणों, परमाणुओं और अणुओं पर भी लागू है… किसी व्यक्ति की पूरी भौतिक सामग्री को मकान की ईंटों के समतुल्य कणों से बदल दें, तो कुछ नहीं होगा।” रॉजर पेनरोज़, द एम्परर्स न्यू माइंड, पेंगुइन बुक्स, 1989, पृ. 24–25।
मस्तिष्क की भूमिका
इस चर्चा से मस्तिष्क की वास्तविक भूमिका का प्रश्न उठता है। चिकित्सा इमेजिंग में किसी कार्य, जैसे सुनने या सूँघने के दौरान मस्तिष्क का कोई हिस्सा सक्रिय दिखे, तो कुछ लोग जल्दबाज़ी में इसे प्रमाण मान लेते हैं कि वही मस्तिष्क उस
![]() मस्तिष्क यहाँ केवल संचार का साधन है, जैसे कंप्यूटर लिखे गए निर्देशों को पहुँचाता और स्क्रीन पर दिखाता है। |
अनुभूति को ग्रहण करता है। यह बिल्कुल निराधार निष्कर्ष है। डार्विनवाद के प्रति इतने प्रबल आग्रह वाले विकासवादी वैज्ञानिक थॉमस हक्सले, जिन्हें “डार्विन का बुलडॉग” कहा जाता है, भी स्वीकार करते हैं:
“तंत्रिका ऊतक को उत्तेजित करने से चेतना जैसी अद्भुत अवस्था कैसे पैदा हो सकती है, यह उतना ही अविश्वसनीय है जितना अलादीन के चिराग़ रगड़ने से जिन्न निकलना।” स्टीवन पिंकर, हाउ द माइंड वर्क्स।
मस्तिष्क यहाँ केवल संचार का साधन है, जैसे कंप्यूटर लिखे गए निर्देश पहुँचाता और स्क्रीन पर दिखाता है। देखने-समझने वाला वह है जो स्क्रीन के सामने है, स्वयं कंप्यूटर नहीं।
डायन ऐकरमैन चेतना का वर्णन इन शब्दों में करती हैं:
“मस्तिष्क ख़ामोश, अँधेरा और जड़ है। वह न कुछ सूँघता, न देखता है… वह पहाड़ों या अंतरिक्ष में जा सकता है। वह सेब की कल्पना करके उसे वास्तविक की तरह अनुभव कर सकता है। फिर भी कल्पित और देखे गए सेब में मुश्किल से फ़र्क़ जानता है… मस्तिष्क मन नहीं है; मन मशीन में किसी अदृश्य आत्मा जैसा है।” ऐकरमैन, ऐन ऐल्कमी ऑफ़ माइंड, पृ. 5।
ऐकरमैन की “मशीन में अदृश्य आत्मा” वही रूह है जो अल्लाह ने जीवों को दी है। शरीर मांस का केवल आवरण है। हमारी पहचान और चेतना अल्लाह की दी रूह से निर्धारित होती हैं।
जब रूह शरीर से अलग होती है
दूसरे अनुभव भी रूह का अस्तित्व दिखाते हैं, जैसे नींद। रोज़ की गतिविधियों के बाद हमारा शरीर थककर चूर हो जाता है और सोना आवश्यक होता है। सोते समय शरीर आराम करता, जीवन-क्रियाएँ शक्ति पातीं और मृत कोशिकाओं की जगह नई आती हैं, जैसे बैटरी चार्ज होती है। यह जैविक पहलू है। लेकिन आध्यात्मिक पहलू क्या है? नींद में चेतना खोने के निकट शरीर का तापमान और हृदयगति घटते हैं। सोए व्यक्ति से बात करें, तो वह उत्तर नहीं देता, मानो दूसरे संसार में व्यस्त हो। ज़ोर से पुकारें, तो रूह शरीर में लौटती है और व्यक्ति ऐसे थका जागता है जैसे लंबा सफ़र किया हो। अल्लाह क़ुरआन में बताता है कि हर रात नींद में हमारी रूहें शरीर से अलग होकर फिर लौटती हैं। शरीर बिस्तर पर लगभग निष्क्रिय पड़ा रहता है, जबकि रूह दूसरे संसार में अन्य अनुभव करती है। इससे भविष्यसूचक सपनों को कुछ समझा जा सकता है: सपने में कुछ देखना और अगले दिन ठीक वैसा हो जाना। केवल शरीर के कार्यों से यह संभव नहीं:
और वही है, जो रात को तुम्हारी रूह़ क़ब्ज़ कर लेता है तथा जानता है जो कुछ तुमने दिन में कमाया। फिर वह तुम्हें उस (दिन) में उठा देता है, ताकि निर्धारित अवधि[46] पूरी की जाए। फिर उसी की ओर तुम्हारा लौटना है, फिर वह तुम्हें बताएगा जो कुछ तुम किया करते थे।[46] अर्थात सांसारिक जीवन की निर्धारित अवधि।क़ुरआन — सूरह Al-An'aam (6:60)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5
रूह कैसी होती है?
रूह के विषय में कई प्रश्न हो सकते हैं: वह कैसी होती है? क्या वह हवा का कोई रूप है? आग से बनी है या प्रकाश से?
जिन लोगों ने रूह का वास्तविक स्वरूप बताने की कोशिश की, वे अतार्किक अटकलों में उलझे, क्योंकि उन्होंने मानव ज्ञान की सीमाओं का ध्यान नहीं रखा। रूह का अस्तित्व दिखाना आसान है, लेकिन वह परोक्ष जगत से संबंधित है। उसका स्वरूप केवल उस जानकारी से जाना जा सकता है जो अल्लाह नबियों के माध्यम से देता है। यही बात मानव अनुभूति से परे सभी विषयों पर लागू है, जैसे जहन्नम, जन्नत और फ़रिश्तों का वर्णन। तो अल्लाह क्या कहता है? नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रूह के बारे में ऐसा ही प्रश्न पूछा गया। तब क़ुरआन में यह उत्तर उतरा:
और वे (ऐ नबी!) आपसे 'रूह' (आत्मा)[54] के विषय में पूछते हैं। आप कह दें : 'रूह' मेरे पालनहार के आदेश से है। और तुम्हें बहुत ही थोड़ा ज्ञान दिया गया है।[54] "रूह़" का अर्थ आत्मा है, जो हर प्राणी के जीवन का मूल है। किंतु उसकी वास्तविकता क्या है? यह कोई नहीं जानता। क्योंकि मनुष्य के पास जो ज्ञान है वह बहुत कम है।क़ुरआन — सूरह Al-Israa (17:85)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5
क्या पशुओं में रूह होती है?
एक और प्रश्न हो सकता है: क्या पशुओं और कीटों में भी रूह होती है? उत्तर है: हाँ! नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथनों के आधार पर मुस्लिम विद्वान सहमत हैं कि पशुओं में भी रूहें हैं। साधारण अवलोकन से भी यह दिखता है, क्योंकि उनमें मनुष्य की तरह चेतना है—हालाँकि उसकी प्रकृति अलग है—जो उन्हें सक्रिय करती और जीवन बिताने देती है।



