विज्ञान गवाही देता है

भौतिकी की गवाही

ऊष्मागतिकी के नियमों से ब्रह्मांड की शुरुआत और उसकी व्यवस्था पर क्या तर्क निकलते हैं? सृष्टिकर्ता और विकासवाद पर इस लेख का विवेचन पढ़ें।

भौतिकी की गवाही

ऊष्मागतिकी का पहला नियम

इस नियम का सार अठारहवीं सदी के फ़्रांसीसी रसायनज्ञ लावुआज़िए के कथन में है: “कुछ नष्ट नहीं होता, कुछ पैदा नहीं होता, सब कुछ रूप बदलता है।”

अंत्वान लावुआज़िए

यह नियम इस तरह कहा जाता है: “पदार्थ और ऊर्जा को न नष्ट किया जा सकता है, न पैदा।” कोई भी प्राकृतिक प्रक्रिया इस नियम के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकती। इसका अर्थ है कि ब्रह्मांड में कोई नया पदार्थ या नई ऊर्जा न प्रकट होती है और न लुप्त।
यह नियम उन लोगों को कठिनाई में डालता है जो कहते हैं कि ब्रह्मांड का समूचा द्रव्यमान “कुछ नहीं” से आ गया। यह सिद्धांत भौतिकी और तर्क, दोनों के विरुद्ध है। यह कैसे माना जाए कि पदार्थ शून्य से निकल आया?
इसका निहितार्थ स्पष्ट है: हमारे ब्रह्मांड के पदार्थ को पैदा करने वाली कोई बाहरी शक्ति अनिवार्य रूप से मौजूद है। यह शक्ति अल्लाह की क़ुदरत ही है।

ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम: नास्तिकता पर घातक प्रहार 

अल्बर्ट आइंस्टीन इसे “समूचे विज्ञान का पहला नियम” कहते हैं। भौतिकी के बुनियादी नियमों में स्वीकृत यह नियम बताता है कि सामान्य परिस्थितियों में अपने हाल पर छोड़ी गई सभी व्यवस्थाएँ अव्यवस्थित होने, बिखरने, बिगड़ने और नष्ट होने की ओर बढ़ती हैं।
यह हम रोज़ देखते हैं। ढलान के ऊपर रखी गेंद हमेशा नीचे लुढ़केगी, ऊपर नहीं। ऊपर पहुँचाने के लिए उसे ऐसी बाहरी शक्ति चाहिए जो उसे फिर ढलान के ऊपर ले जाए।

दूसरे नियम का उदाहरण: परमाणु बम के कारण विखंडित परमाणु स्वयं जुड़कर फिर परमाणु नहीं बन सकता। इसके लिए उसे समेटने वाली बहुत बड़ी बाहरी शक्ति चाहिए।

ब्रह्मांड पर यह सिद्धांत लागू करें, तो ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम बताता है कि उसमें उपलब्ध ऊर्जा निरंतर घट रही है और ब्रह्मांड अव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इससे कई बातें निकलती हैं:
— एंट्रॉपी के नियम का अर्थ है कि ब्रह्मांड अनादि नहीं है; उसकी शुरुआत हुई है । वरना ऊर्जा फैल चुकी होती और ब्रह्मांड ऊष्मीय संतुलन में पहुँच गया होता। सितारे अपनी गर्मी दूसरे ठंडे खगोलीय पिंडों को देकर बुझ चुके होते और पदार्थ पूरे ब्रह्मांड में समान रूप से फैल गया होता। आज ऐसा नहीं है, इसलिए ब्रह्मांड की शुरुआत हुई है।
— एंट्रॉपी का नियम डार्विन के विकासवाद को ध्वस्त करता है । विकासवाद ठीक उलटा विचार देता है: ब्रह्मांड बेहतर और अधिक व्यवस्थित होता जाता है। उसका दावा है कि अव्यवस्थित, बिखरे और निर्जीव परमाणु समय के साथ स्वयं एक निश्चित क्रम और योजना में जुड़ गए; उनसे प्रोटीन, डीएनए और आरएनए जैसे अत्यंत जटिल अणु बने, फिर लाखों अत्यंत जटिल प्रजातियाँ बनीं। यह प्रक्रिया भौतिक नियमों से पूरी तरह टकराती है। विकासवादी जानते हैं कि यह नियम उनके सिद्धांत के लिए कठिनाई है। विकासवादी वैज्ञानिक रॉजर ल्यूइन साइंस पत्रिका के एक लेख में कहते हैं:
“जीवविज्ञानियों के सामने एक समस्या विकास और ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम के बीच दिखाई देने वाला विरोध है। समय के साथ व्यवस्थाओं का क्षय होना चाहिए, जिससे व्यवस्था बढ़ने के बजाय घटती है।” रॉजर ल्यूइन, “अ डाउनवर्ड स्लोप टू ग्रेटर डाइवर्सिटी”, साइंस, खंड 217, 24 सितंबर 1982, पृ. 1239।
प्रसिद्ध विकासवादी पत्रिका अमेरिकन साइंटिस्ट में एक अन्य विकासवादी वैज्ञानिक, जॉर्ज स्ताव्रोपोलोस, जीवन के स्वयं उत्पन्न होने की ऊष्मागतिक असंभवता और जटिल जैविक तंत्रों का अस्तित्व प्राकृतिक नियमों से न समझा पाने की चर्चा करते हैं:
“सामान्य परिस्थितियों में कोई जटिल कार्बनिक अणु स्वयं नहीं बन सकता। दूसरे नियम के अनुसार उसका विघटन होगा। वास्तव में वह जितना जटिल होगा, उतना अस्थिर होगा, जिससे देर-सवेर उसका टूटना निश्चित है। भ्रमपूर्ण या जानबूझकर भ्रामक भाषा के बावजूद प्रकाश-संश्लेषण, जीवन की सभी प्रक्रियाएँ और स्वयं जीवन भी अभी ऊष्मागतिकी या किसी अन्य सटीक विज्ञान के आधार पर नहीं समझे जा सकते।” जॉर्ज पी. स्ताव्रोपोलोस, “विज्ञान की सीमाएँ और सरहदें”, अमेरिकन साइंटिस्ट, खंड 65, नवंबर–दिसंबर 1977, पृ. 674।
एंट्रॉपी के नियम का अर्थ है कि अपने हाल पर छोड़ा गया ब्रह्मांड कभी वर्तमान व्यवस्था तक नहीं पहुँचता। इसलिए ब्रह्मांड के बाहर ऐसी शक्ति का होना आवश्यक है जिसने उसे व्यवस्थित किया। यह शक्ति सृष्टिकर्ता की क़ुदरत ही है।

“जादुई” विकास

विज्ञान और तर्क की दृष्टि से ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम विकास की काल्पनिक कहानी के लिए ऐसी बाधा है जिसे पार नहीं किया जा सकता। इसे दूर करने की कोई सुसंगत वैज्ञानिक व्याख्या न दे पाने के कारण नास्तिक और विकासवादी केवल अपनी कल्पना में इसे पार कर पाते हैं।

वे केवल “जादू” शब्द का सहारा ले सके।

मसलन, प्रसिद्ध विकासवादी जेरेमी रिफ़किन कहते हैं कि विकास इस भौतिक नियम को अपनी “जादुई शक्ति” से परास्त करता है:
“एंट्रॉपी का नियम बताता है कि विकास इस ग्रह पर जीवन के लिए उपलब्ध सारी ऊर्जा को बिखेरता है। विकास की हमारी अवधारणा ठीक इसके उलट है। हम मानते हैं कि विकास किसी जादुई ढंग से धरती पर अधिक मूल्य और ऊँची व्यवस्था पैदा करता है।” जेरेमी रिफ़किन, एंट्रॉपी: अ न्यू वर्ल्ड व्यू, पृ. 555।

इसके बाद कैसे कहा जा सकता है कि नास्तिकता विज्ञान या किसी तर्क का दावा कर सकती है? अपनी काल्पनिक कहानियों की व्याख्या के लिए सबसे बुनियादी भौतिक नियमों को मोड़ने में वे केवल “जादू” शब्द का उपयोग कर सके। इससे पता चलता है कि नास्तिकता कितनी कट्टर मान्यता है।

दावों का उत्तर: खुली प्रणाली का छल

इस कठिनाई से निकलने के लिए कुछ नास्तिक और विकासवादी अक्सर कहते हैं: “यह ‘निष्कर्ष’ एक बंद प्रणाली की कुल एंट्रॉपी पर लागू होता है, जबकि धरती बंद प्रणाली नहीं है। यदि ऊर्जा का आदान-प्रदान ऐसी दूसरी जगह से हो जहाँ एंट्रॉपी उससे अधिक बढ़ती हो, तो स्थानीय स्तर पर एंट्रॉपी घट सकती है। धरती पर जीवन के मामले में सामान्यतः वह जगह सूरज है, या अधिक सटीक रूप में धरती को मिलने वाले सौर विकिरण का रूपांतरण है।”

“खुली प्रणाली” ऐसी ऊष्मागतिक प्रणाली है जिसमें ऊर्जा आती-जाती है। इसके विपरीत “बंद प्रणाली” में प्रारंभिक पदार्थ और ऊर्जा स्थिर रहते हैं। विकासवादी कहते हैं कि धरती खुली प्रणाली है, यानी सूरज से आने वाली ऊर्जा के प्रवाह में लगातार रहती है; इसलिए एंट्रॉपी का नियम पूरी धरती पर लागू नहीं होता और अव्यवस्थित, सरल, निर्जीव संरचनाओं से व्यवस्थित तथा जटिल जीव बन सकते हैं।
लेकिन इस कथन में बड़ा विकृतिकरण है। किसी प्रणाली को सूरज जैसा ऊर्जा-स्रोत मिल जाने से वह “व्यवस्थित” नहीं हो जाती। उसे उस ऊर्जा के उपयोग के लिए विशेष तंत्र चाहिए। यह ऐसा है जैसे इंजन के बिना कार में डीज़ल भरकर चाबी घुमाई जाए और उसके चलने की प्रतीक्षा की जाए!
धरती पर जीवन के साथ भी यही है। सूरज की किरणों से कितनी भी ऊर्जा मिले, जीवों में अत्यंत जटिल ऊर्जा-रूपांतरण तंत्रों के बिना वह व्यवस्था नहीं बना सकती। पौधों का प्रकाश-संश्लेषण और मनुष्य तथा पशुओं के पाचन-तंत्र इसके उदाहरण हैं।

केवल सूरज की ऊर्जा व्यवस्था पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इन ऊर्जा-रूपांतरण तंत्रों के बिना कोई जीव जीवित नहीं रह सकता। ऐसे तंत्र न हों, तो सूरज केवल ऐसी विनाशकारी ऊर्जा का स्रोत बनकर रह जाता है जो जलाती, सुखाती या पिघलाती है।
धरती की जिन आदिम परिस्थितियों की कल्पना की जाती है, उनमें ऊर्जा-रूपांतरण का कोई ऐसा तंत्र मौजूद नहीं था। इसलिए सृष्टि के तथ्य को हटा दें, तो सूरज का प्रभाव विनाशकारी होने के अलावा कुछ नहीं हो सकता था।
निष्कर्ष स्पष्ट है: केवल सूरज की ऊर्जा व्यवस्था पैदा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए ऊर्जा-रूपांतरण तंत्रों के अभाव में धरती के वातावरण पर ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम लागू रहता है। हर स्तर पर इस व्यवस्था का वास्तविक और मूल स्रोत सचेत अभिकल्प है: अल्लाह।