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उत्परिवर्तन 
 चेर्नोबिल के प्रभाव
मनुष्यों में उत्परिवर्तन का मुख्य कारण रेडियोधर्मिता है। उसके प्रभाव हमेशा हानिकारक होते हैं। चेर्नोबिल दुर्घटना से उत्परिवर्तन झेलने वाले घातक कैंसर या विकृत अंगों के शिकार हुए, जैसा चित्र में दिखता है। उत्परिवर्तन जीवों में होने वाली आनुवंशिक दुर्घटनाएँ हैं। हर दुर्घटना की तरह हानिकारक और विनाशकारी हैं। उनके द्वारा “विकास” उतना ही असंभाव्य है जितना हथौड़ा मारकर घड़ी को बेहतर करना। प्राकृतिक चयन की विकासकारी भूमिका न देखकर विकासवादियों ने बीसवीं सदी में “उत्परिवर्तन” जोड़ा। ये विकिरण जैसे बाहरी प्रभावों से जीन में विकृतियाँ हैं। दावा है कि ये दुर्घटनाएँ जीवों को विकसित करती हैं। लेकिन वैज्ञानिक नतीजे इसे नकारते हैं, क्योंकि सभी देखे जा सकने वाले उत्परिवर्तन जीवों को हानि देते हैं। मनुष्यों के सभी उत्परिवर्तन मानसिक या शारीरिक विकृतियाँ, जैसे डाउन सिंड्रोम, ऐल्बिनिज़्म और बौनापन, या कैंसर जैसी बीमारियाँ पैदा करते हैं।
 डीएनए में विकृति
डीएनए का कूट जीवों के शारीरिक गुण तय करता है। विकिरण जैसे बाहरी प्रभाव से उसमें स्थानांतरण या पुनर्स्थापन हो, तो उत्परिवर्तन होता है। इसके विकास न कर सकने की एक और वजह है कि ये दुर्घटनाएँ नई आनुवंशिक जानकारी नहीं जोड़तीं। वे मौजूदा जानकारी को ताश के पत्तों की तरह बेतरतीब फेर देती हैं। दूसरे शब्दों में, नई सूचना नहीं आती। “डी व्रीस” की भूल
उत्परिवर्तन का तंत्र खोजने वाले डच वनस्पतिविज्ञानी ह्यूगो डी व्रीस ने सोचा कि “विकास का तंत्र” मिल गया। लेकिन वर्षों के प्रयोगों और अवलोकनों ने दिखाया कि ये केवल “विकृति के तंत्र” हैं। विकासवाद कहता है कि आनुवंशिक जानकारी समय के साथ बढ़ती है। मसलन, सरल जीवाणु में 2,000 प्रकार के प्रोटीन और मनुष्य में 1,00,000 हैं। जीवाणु से मनुष्य बनने के लिए ठीक 98,000 नए प्रोटीन चाहिए। उत्परिवर्तन से ये संरचनाएँ नहीं बन सकतीं, क्योंकि वे डीएनए शृंखला में कुछ नहीं जोड़ सकते। आश्चर्य नहीं कि अब तक किसी उत्परिवर्तन में जीव की आनुवंशिक जानकारी बढ़ती नहीं देखी गई। स्वयं विकासवादी फ़्रांसीसी विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पियेर-पॉल ग्रासे ने माना: “उत्परिवर्तन कितने भी हों, किसी प्रकार का विकास नहीं करते।” पियेर-पॉल ग्रासे, इवोल्यूशन ऑफ़ लिविंग ऑर्गैनिज़्म्स, अकैडमिक प्रेस, न्यूयॉर्क, 1977, पृ. 88।
जुड़वाँ उत्परिवर्तन
मनुष्यों में “जुड़े हुए जुड़वाँ” बनने का विकार उत्परिवर्तन से होता है। जन्म से जुड़े ये जुड़वाँ मेंढक उसके परिणामों का अनुमान देते हैं।
फल-मक्खियों पर प्रयोग
दशकों तक विकासवादियों ने फल-मक्खियों पर उत्परिवर्तन के प्रयोग किए, क्योंकि वे तेज़ी से प्रजनन करती हैं और उनमें आसानी से उत्परिवर्तन होता है। उन्हें हर संभव तरीके से लाखों बार उत्परिवर्तित किया गया। लेकिन एक भी लाभकारी उत्परिवर्तन नहीं दिखा।
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