विकासवाद का मिथक

डार्विनवाद के प्रस्तावित तंत्रों का खंडन

क्या प्राकृतिक चयन और उत्परिवर्तन नई प्रजातियाँ बना सकते हैं? इस लेख में लैमार्क, औद्योगिक मेलानिज़्म और आनुवंशिक बदलावों पर दिए तर्क पढ़ें।

डार्विनवाद के प्रस्तावित तंत्रों का खंडन

प्राकृतिक चयन की ग़लत धारणा
डार्विन की किताब: प्राकृतिक चयन के माध्यम से प्रजातियों की उत्पत्ति… डार्विन ने प्राकृतिक चयन को विकास का तंत्र बताया, लेकिन उसमें विकास कराने की शक्ति नहीं थी। प्राकृतिक चयन नई प्रजातियाँ नहीं बना सकता। जैसे धरती पर जीवन का संयोग से बनना असंभव है, वैसे ही एक प्रजाति का दूसरी बनना भी। प्रकृति में ऐसी शक्ति नहीं। प्रकृति कहलाने वाली चीज़ धरती, चट्टान, हवा, पानी और बाकी सब बनाने वाले अचेतन परमाणुओं का समूह है। यह बेजान पदार्थ किसी अकशेरुकी को मछली बनाने, उसे ज़मीन पर लाने, सरीसृप बनाने, फिर पक्षी बनाकर उड़ाने और अंततः मनुष्य बनाने की शक्ति नहीं रखता। 

लैमार्क की परिकल्पना:

“प्राकृतिक चयन प्रजातियों का विकास करता है” कहते समय डार्विन लैमार्क की “अर्जित गुणों की वंशागति” से प्रेरित थे। लैमार्क के अनुसार ऊँची डालियों से भोजन लेने की कोशिश में जिराफ़ों की गर्दन लंबी हुई। लेकिन बीसवीं सदी में लैमार्कवाद ग़लत सिद्ध हुआ। विपरीत दावा करते डार्विन केवल एक “विकास-तंत्र”, प्राकृतिक चयन पर निर्भर हैं। विचार है कि आवास के लिए सबसे अनुकूल और शक्तिशाली जीव बचते हैं। मसलन, जंगली पशुओं से ख़तरे में पड़े हिरनों के झुंड में सबसे तेज़ दौड़ने वाले बचेंगे। लेकिन इससे हिरन विकसित होकर हाथी जैसे दूसरे जीव नहीं बनेंगे। प्राकृतिक चयन से जीवों के विकास का रत्ती भर भी प्रायोगिक प्रमाण नहीं। प्रमुख विकासवादी, ब्रिटिश जीवाश्मविज्ञानी कॉलिन पैटरसन स्वीकार करते हैं: “किसी ने कभी प्राकृतिक चयन के तंत्रों से प्रजाति नहीं बनाई। कोई इसके क़रीब भी नहीं पहुँचा, और नव-डार्विनवाद के अधिकतर वर्तमान विवाद इसी प्रश्न पर हैं।”कॉलिन पैटरसन, “क्लैडिस्टिक्स”, बीबीसी, ब्रायन लीक और पीटर फ़्रांज़ के साथ साक्षात्कार, 4 मार्च 1982।

चयन नई प्रजातियाँ नहीं बना सकता

प्रकृति में कमज़ोर हटते हैं और शक्तिशाली उनकी जगह लेते हैं। लेकिन इससे नई प्रजातियाँ नहीं आतीं। अरबों वर्षों तक शिकारी कमज़ोर और धीमे हिरनों को मारें, तब भी हिरन दूसरी प्रजाति नहीं बनेंगे। औद्योगिक मेलानिज़्म की कहानी







गहरे और हल्के रंग के पतंगे औद्योगिक क्रांति से पहले भी थे और बाद में भी। कोई नई प्रजाति नहीं बनी।


पतंगों का संग्रह दिखाता है कि क्रांति से पहले भी क्षेत्र में काले और अन्य रंगों के पतंगे थे। विकासवादी अठारहवीं सदी के इंग्लैंड के “औद्योगिक क्रांति के पतंगों” को “प्राकृतिक चयन से प्रत्यक्ष विकास” कहते हैं। उनके अनुसार शुरुआत में मैनचेस्टर के पेड़ों की छाल हल्की थी। काले पतंगे पक्षियों को आसानी से दिखते, इसलिए शिकार होकर विलुप्ति की ओर बढ़ते थे। प्रदूषण से छाल काली होने पर हल्के पतंगे शिकार बनने लगे और कालों की संख्या बढ़ी; पहले की स्थिति उलट गई। लेकिन यह “विकास” नहीं, क्योंकि चयन ने पहले न मौजूद कोई प्रजाति नहीं बनाई। काले पतंगे बहुत पहले से थे। यहाँ संग्रहकर्ता के औद्योगिक क्रांति से पहले और बाद के पतंगे हैं। केवल मौजूदा प्रजातियों की संख्या बदली। न नया अंग आया, न पतंगे बदलकर दूसरी प्रजाति बने। 

पशुओं का त्याग

प्राकृतिक चयन से विकास का डार्विन का सिद्धांत मानता था कि सभी जीव अस्तित्व के लिए भयंकर संघर्ष करते हैं। लेकिन अवलोकनों ने पशुओं में अद्भुत त्याग और सहयोग दिखाया। बच्चों की रक्षा के लिए घेरा बनाते जंगली बैल प्रकृति में आत्मत्याग के अनेक उदाहरणों में एक हैं।

उत्परिवर्तन


चेर्नोबिल के प्रभाव

मनुष्यों में उत्परिवर्तन का मुख्य कारण रेडियोधर्मिता है। उसके प्रभाव हमेशा हानिकारक होते हैं। चेर्नोबिल दुर्घटना से उत्परिवर्तन झेलने वाले घातक कैंसर या विकृत अंगों के शिकार हुए, जैसा चित्र में दिखता है। उत्परिवर्तन जीवों में होने वाली आनुवंशिक दुर्घटनाएँ हैं। हर दुर्घटना की तरह हानिकारक और विनाशकारी हैं। उनके द्वारा “विकास” उतना ही असंभाव्य है जितना हथौड़ा मारकर घड़ी को बेहतर करना। प्राकृतिक चयन की विकासकारी भूमिका न देखकर विकासवादियों ने बीसवीं सदी में “उत्परिवर्तन” जोड़ा। ये विकिरण जैसे बाहरी प्रभावों से जीन में विकृतियाँ हैं। दावा है कि ये दुर्घटनाएँ जीवों को विकसित करती हैं। लेकिन वैज्ञानिक नतीजे इसे नकारते हैं, क्योंकि सभी देखे जा सकने वाले उत्परिवर्तन जीवों को हानि देते हैं। मनुष्यों के सभी उत्परिवर्तन मानसिक या शारीरिक विकृतियाँ, जैसे डाउन सिंड्रोम, ऐल्बिनिज़्म और बौनापन, या कैंसर जैसी बीमारियाँ पैदा करते हैं।


डीएनए में विकृति

डीएनए का कूट जीवों के शारीरिक गुण तय करता है। विकिरण जैसे बाहरी प्रभाव से उसमें स्थानांतरण या पुनर्स्थापन हो, तो उत्परिवर्तन होता है। इसके विकास न कर सकने की एक और वजह है कि ये दुर्घटनाएँ नई आनुवंशिक जानकारी नहीं जोड़तीं। वे मौजूदा जानकारी को ताश के पत्तों की तरह बेतरतीब फेर देती हैं। दूसरे शब्दों में, नई सूचना नहीं आती। “डी व्रीस” की भूल

उत्परिवर्तन का तंत्र खोजने वाले डच वनस्पतिविज्ञानी ह्यूगो डी व्रीस ने सोचा कि “विकास का तंत्र” मिल गया। लेकिन वर्षों के प्रयोगों और अवलोकनों ने दिखाया कि ये केवल “विकृति के तंत्र” हैं। विकासवाद कहता है कि आनुवंशिक जानकारी समय के साथ बढ़ती है। मसलन, सरल जीवाणु में 2,000 प्रकार के प्रोटीन और मनुष्य में 1,00,000 हैं। जीवाणु से मनुष्य बनने के लिए ठीक 98,000 नए प्रोटीन चाहिए। उत्परिवर्तन से ये संरचनाएँ नहीं बन सकतीं, क्योंकि वे डीएनए शृंखला में कुछ नहीं जोड़ सकते। आश्चर्य नहीं कि अब तक किसी उत्परिवर्तन में जीव की आनुवंशिक जानकारी बढ़ती नहीं देखी गई। स्वयं विकासवादी फ़्रांसीसी विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पियेर-पॉल ग्रासे ने माना: “उत्परिवर्तन कितने भी हों, किसी प्रकार का विकास नहीं करते।” पियेर-पॉल ग्रासे, इवोल्यूशन ऑफ़ लिविंग ऑर्गैनिज़्म्स, अकैडमिक प्रेस, न्यूयॉर्क, 1977, पृ. 88। 

जुड़वाँ उत्परिवर्तन

मनुष्यों में “जुड़े हुए जुड़वाँ” बनने का विकार उत्परिवर्तन से होता है। जन्म से जुड़े ये जुड़वाँ मेंढक उसके परिणामों का अनुमान देते हैं।

 

फल-मक्खियों पर प्रयोग

दशकों तक विकासवादियों ने फल-मक्खियों पर उत्परिवर्तन के प्रयोग किए, क्योंकि वे तेज़ी से प्रजनन करती हैं और उनमें आसानी से उत्परिवर्तन होता है। उन्हें हर संभव तरीके से लाखों बार उत्परिवर्तित किया गया। लेकिन एक भी लाभकारी उत्परिवर्तन नहीं दिखा।