विकासवाद का मिथक

रचना की योजना विकासवाद का खंडन करती है

प्रोटीन, कोशिका और डीएनए की जटिलता को यह लेख रचना की योजना का प्रमाण मानता है। संयोग, आनुवंशिक सूचना और जीवन की उत्पत्ति के तर्क पढ़ें।

रचना की योजना विकासवाद का खंडन करती है

प्रोटीन में अभिकल्प

हीमोग्लोबिन अणु की जटिल संरचना
अभी “पहली कोशिका कहाँ से आई?” प्रश्न छोड़कर एक सरल प्रश्न पूछें: “पहला प्रोटीन कहाँ से आया?” विकासवाद के पास इसका भी उत्तर नहीं। प्रोटीन कोशिका की निर्माण-इकाइयाँ हैं। कोशिका को विशाल गगनचुंबी इमारत मानें, तो प्रोटीन उसकी ईंटें हैं। लेकिन ईंटों की तरह उनकी आकृति और संरचना एक जैसी नहीं होती। सबसे सरल कोशिकाओं में भी लगभग 2,000 प्रकार के प्रोटीन होते हैं। उनके असाधारण सामंजस्यपूर्ण काम से ही कोशिका जीवित रहती है। प्रोटीन छोटी संरचनाओं, यानी “अमीनो अम्ल” नामक अणुओं से बनते हैं। ये कार्बन, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन परमाणुओं के अलग-अलग संयोजनों से बनते हैं। औसत प्रोटीन में 500 से 1,000 अमीनो अम्ल होते हैं; कुछ और बड़े होते हैं।
प्रोटीन की वास्तुकला सूक्ष्म अभिकल्प वाले प्रोटीन हमारे शरीर की रचना में काम आते हैं। इसलिए हम मुख्यतः प्रोटीन से बने हैं। हड्डियों, आँखों, बालों और मांसपेशियों की मूल सामग्री वही हैं। यहाँ मांसपेशी के एक रेशे की जटिल आंतरिक व्यवस्था दिखती है। अलग-अलग प्रोटीन संरचना वाली कोशिकाएँ इस बनावट का हर सूक्ष्म हिस्सा बनाती हैं। प्रोटीन नाम की कार्बनिक सामग्री से हर हिस्सा उत्कृष्ट ढंग से रचा और बनाया गया है। प्रोटीन की आकर्षक वास्तुकला सृष्टि की सबसे स्पष्ट निशानियों में है।
सबसे महत्वपूर्ण है कि प्रोटीन बनाने के लिए अमीनो अम्ल निश्चित क्रम में लगें। जीवों में बीस प्रकार के अमीनो अम्ल इस्तेमाल होते हैं। वे बेतरतीब मिलकर प्रोटीन नहीं बनाते। हर प्रोटीन का विशेष अनुक्रम है और उसे सटीक जोड़ना पड़ता है। एक अमीनो अम्ल की कमी या बदलाव भी प्रोटीन को बेकार अणुओं का ढेर बना देता है। इसलिए हर अमीनो अम्ल सही स्थान और क्रम में होना चाहिए। इस क्रम के निर्देश कोशिका के डीएनए में हैं और उन्हीं के अनुसार प्रोटीन बनते हैं। विकासवाद कहता है कि पहला प्रोटीन “संयोग” से बना। लेकिन प्रायिकता की गणनाएँ बताती हैं कि यह किसी तरह संभव नहीं। मसलन, 500 अमीनो अम्लों वाले प्रोटीन का अनुक्रम सही होने की संभावना 10 की घात 950 में एक है। देखें: हारून यह्या, विकासवाद का झूठ, एदिसियों एस्सलाम, 1999, पृ. 141–142। 10 की घात 950 अकल्पनीय संख्या है: एक के बाद 950 शून्य। गणित में 10 की घात 50 में एक से भी छोटी प्रायिकता को लगभग असंभव माना जाता है।
प्रोटीन संश्लेषण कोशिकाओं में निरंतर काम होता है: भोजन के प्रोटीन टूटते हैं और उनके हिस्से, अमीनो अम्ल, डीएनए के कूट के अनुसार फिर जुड़ते हैं। इससे शरीर के आवश्यक नए प्रोटीन बनते हैं। “प्रोटीन संश्लेषण” नाम की यह प्रक्रिया इस सरल चित्र से कहीं अधिक जटिल है। कोई प्रयोगशाला कोशिका जितनी कुशलता से प्रोटीन संश्लेषण नहीं कर सकती।
संक्षेप में, एक प्रोटीन भी संयोग से नहीं बन सकता। विकासवादी कभी-कभी इसे मानते भी हैं। प्रसिद्ध विकासवादी वैज्ञानिक हैरॉल्ड ब्लम कहते हैं: “सबसे छोटे ज्ञात प्रोटीन जितने आकार का पॉलीपेप्टाइड स्वयं बनना हर संभावना से परे लगता है।”डब्ल्यू. आर. बर्ड, द ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज़ रिविज़िटेड, नैशविल: थॉमस नेल्सन कंपनी, 1991, पृ. 304। इस सबका अर्थ क्या है? रसायनशास्त्र के प्रोफ़ेसर पेरी रीव्स उत्तर देते हैं: “सूखते आदिम तालाब में अमीनो अम्लों के साधारण संयोगपूर्ण मेल से बन सकने वाली विशाल संख्या की संरचनाएँ देखें, तो यह मानना विस्मयकारी है कि जीवन ऐसे बना। अधिक संभव है कि इस काम के लिए समग्र योजना और रणनीति वाला महान निर्माता आवश्यक रहा हो।” जे. डी. थॉमस, इवोल्यूशन ऐंड फ़ेथ, एबिलीन, टेक्सस: एसीयू प्रेस, 1988, पृ. 81–82।
क्या बंदर किताब लिख सकते हैं? साइटोक्रोम-सी ऑक्सीजन से श्वसन संभव बनाने वाले सबसे महत्वपूर्ण प्रोटीनों में एक का वैज्ञानिक नाम है। इसलिए जीवन के लिए आवश्यक है। अत्यंत जटिल रचना वाला यह प्रोटीन संयोग से नहीं बन सकता। तुर्किये में विकासवाद के प्रमुख समर्थक प्रोफ़ेसर अली देमिरसोय अपनी किताब “आनुवंशिकता और विकास” में कहते हैं कि उसका संयोग से बनना “उतना ही असंभाव्य है जितना बंदर का टाइपराइटर पर बिना ग़लती मानवता का इतिहास लिख देना।”अली देमिरसोय, कालितिम वे एव्रिम, अंकारा: मेतेक्सान यायिनलारी, 1984, पृ. 64।
साइटोक्रोम-सी प्रोटीन
 
कोशिका में अभिकल्प
सभी जीव कोशिकाओं से बने हैं। एक कोशिका भी अपने आप में सक्षम है: अपना भोजन बना सकती, चल सकती और दूसरी कोशिकाओं से संवाद कर सकती है। अपनी असाधारण तकनीक से वह ठोस प्रमाण है कि जीवन संयोग से नहीं आया।
मस्तिष्क की कोशिका की जटिलता मस्तिष्क में 10,000 से अधिक कोशिकाएँ लगातार एक-दूसरे से संपर्क में रहती हैं। यह संचार नेटवर्क संसार के सभी संचार केंद्रों से अधिक जटिल है।
जिस कोशिका का एक प्रोटीन भी संयोग से नहीं बन सकता, वह अभिकल्प का ऐसा चमत्कार है जो “संयोग” से विकास की परिकल्पना को निरर्थक बना देता है। उसमें बिजलीघर, जटिल कारख़ाने, विशाल सूचना-भंडार, भंडारण प्रणालियाँ और उन्नत शोधन केंद्र हैं। डार्विन के समय कोशिका की असाधारण संरचना ज्ञात नहीं थी। उस युग के कमज़ोर सूक्ष्मदर्शियों में वह धुँधला पिंड दिखती थी। इसलिए डार्विन और समकालीन विकासवादी उसे पानी की साधारण बूँद समझते थे जो आसानी से संयोग से बन सकती है। इसी आदिम वैज्ञानिक मत से जीवन को संयोग का परिणाम मान लिया गया।
शरीर में घुसे रोगाणुओं को पकड़ती प्रतिरक्षा कोशिका।
लेकिन बीसवीं सदी की वैज्ञानिक प्रगति ने दिखाया कि कोशिका की व्यवस्था अविश्वसनीय रूप से जटिल है। आज स्थापित है कि ऐसी गूढ़ रचना संयोग से नहीं बन सकती, जैसा विकासवाद कहता है। जिसे मनुष्य भी दोहरा नहीं सकता, ऐसी जटिल संरचना “संयोग” का काम नहीं हो सकती। प्रसिद्ध ब्रिटिश गणितज्ञ और खगोलशास्त्री प्रोफ़ेसर फ़्रेड हॉयल यह असंभवता बताते हैं:
“इस तरह जटिल जीवन उत्पन्न होने की संभावना उस जैसी है कि कबाड़खाने से गुज़रता बवंडर वहाँ की सामग्री से बोइंग 747 जोड़ दे।”“हॉयल ऐंड इवोल्यूशन”, नेचर, खंड 294, 12 नवंबर 1981, पृ. 105।
पौधों की कोशिकाएँ मनुष्य और पशुओं की कोशिकाओं की तरह पौधों की कोशिका भी सृष्टि का मोजिज़ा है। वह प्रकाश-संश्लेषण करती है, जिसे आज कोई प्रयोगशाला नहीं कर सकती। “हरितलवक” नाम का कोशिकांग पानी, कार्बन डाइऑक्साइड और धूप से स्टार्च बनाना संभव करता है। यह पदार्थ सभी जीवों के भोजन का स्रोत है। इस अत्यंत जटिल प्रक्रिया के सभी विवरण आज भी ज्ञात नहीं।
हॉयल एक अन्य टिप्पणी में कहते हैं: “यह सिद्धांत कि जीवन किसी बुद्धिमत्ता ने संयोजित किया, इतना स्पष्ट है कि आश्चर्य होता है कि इसे व्यापक रूप से स्वतः स्पष्ट सत्य क्यों नहीं माना जाता। कारण वैज्ञानिक से अधिक मनोवैज्ञानिक हैं।” फ़्रेड हॉयल और चंद्र विक्रमसिंघे, इवोल्यूशन फ़्रॉम स्पेस, न्यूयॉर्क: साइमन ऐंड शूस्टर, 1984, पृ. 130।
क्या विमान संयोग से बन सकता है? कोशिका की रचना इतनी जटिल है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ़्रेड हॉयल, दाईं ओर, उसकी तुलना बोइंग 747 से करते हैं। उनके अनुसार जैसे विमान संयोग से नहीं बन सकता, कोशिका भी नहीं। उदाहरण एक और महत्वपूर्ण सत्य दिखाता है: मनुष्य अपने ज्ञान और तकनीक से विशाल विमान बना सकता है, लेकिन अभी एक नन्ही कोशिका भी नहीं बना सकता।
 

आनुवंशिक सूचना

क्या आप जानते हैं कि मनुष्य की खरबों कोशिकाओं में प्रत्येक के केंद्रक में 900 खंडों का विश्वकोश भरने जितना विशाल सूचना-भंडार है?

फ़्रांसिस क्रिक और जेम्स वॉटसन ने डीएनए की संरचना खोजी। विकासवादी होने के बावजूद क्रिक ने कहा कि डीएनए महज़ संयोग से कभी नहीं बन सकता था।
डीएनए हर जीवित कोशिका के केंद्रक में छिपा विशाल अणु है। जीव के सभी शारीरिक गुण इस कुंडलाकार अणु में कूटबद्ध हैं। आँखों के रंग से आंतरिक अंगों की संरचना और कोशिकाओं के आकार तथा कार्यों तक की जानकारी डीएनए के जीन नामक खंडों में दर्ज है।

डीएनए का कूट चार अलग क्षारकों के अनुक्रमों से बनता है। हर क्षारक को अक्षर मानें, तो डीएनए चार अक्षरों की वर्णमाला से बने सूचना-भंडार जैसा है। जीव की सारी जानकारी उसमें संचित है।

डीएनए की जानकारी लिखने में लगभग दस लाख पन्ने लगेंगे। यह मानव ज्ञान के सबसे बड़े संग्रहों में एक, एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका से चालीस गुना बड़ा विश्वकोश होगा। इतनी अविश्वसनीय जानकारी कोशिकाओं के छोटे केंद्रक में संचित है, जिसका आकार लगभग एक हज़ार मिलीमीटर है।

गणना के अनुसार चाय की चम्मच में समा सकने वाली डीएनए शृंखला अब तक लिखी सभी किताबों की पूरी जानकारी सँभाल सकती है।

प्रजनन का मोजिज़ा उपयुक्त वातावरण में रखा जीवाणु कुछ घंटों में अपनी जैसी सैकड़ों प्रतियाँ बनाता है। हर जीवित कोशिका स्वयं की “नक़ल” बना सकती है। डीएनए की जानकारी से पहले यह प्रक्रिया अस्पष्ट थी। इस खोज के बाद स्थापित हुआ कि हर कोशिका के पास अपनी पूरी जानकारी रखने वाला “सूचना-भंडार” है। इस अद्भुत खोज ने फिर सृष्टि के चमत्कार सामने रखे।
डीएनए में केवल कोशिकाओं की योजना नहीं, जीव के पूरे शरीर की व्यवस्था है। आंतरिक अंगों की संरचना हो या पक्षी के पंख का आकार, हर सूक्ष्म विवरण उसमें कूटबद्ध है।

ऐसी अद्भुत संरचना निश्चय ही संयोग से नहीं बन सकती। इससे सिद्ध होता है कि अल्लाह ने जीवन बनाया। आश्चर्य नहीं कि विकासवादी डीएनए की उत्पत्ति नहीं समझा पाते! फिर भी सिद्धांत बचाने के लिए “संयोग” अपनाते हैं। प्रसिद्ध ऑस्ट्रेलियाई आणविक जीवविज्ञानी माइकल डेंटन अपनी किताब इवोल्यूशन: अ थ्योरी इन क्राइसिस अर्थात “विकास: संकट में एक सिद्धांत” में समझाते हैं:

“संदेहशील व्यक्ति के लिए यह प्रस्ताव बुद्धि का अपमान है कि जटिल जीवों के आनुवंशिक कार्यक्रम महज़ बेतरतीब प्रक्रिया से बने। इनमें लगभग एक अरब सूचनाएँ हैं, जो हज़ार खंडों के छोटे पुस्तकालय के अक्षरों के बराबर हैं। इनमें कूटबद्ध असंख्य हज़ारों जटिल एल्गोरिद्म अरबों-अरब कोशिकाओं की वृद्धि और विकास को नियंत्रित, निर्धारित तथा व्यवस्थित करके जटिल जीव बनाते हैं। लेकिन डार्विनवादी इसे बिना किसी संदेह स्वीकार लेते हैं—प्रतिमान सबसे ऊपर है!” माइकल डेंटन, इवोल्यूशन: अ थ्योरी इन क्राइसिस, लंदन: बर्नेट बुक्स, 1985, पृ. 351।

भेड़िए के फ़र की जैवरासायनिक बनावट, मोटाई, रंग और बालों का झुकाव डीएनए में कूटबद्ध हैं।