नास्तिकों के दावे और उनके जवाब

क्या अल्लाह ऐसा कर सकता है?

क्या अल्लाह ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे वह उठा न सके? सर्वशक्तिमत्ता और तार्किक असंभवता का अंतर संवाद और उदाहरणों के माध्यम से समझें।

क्या अल्लाह ऐसा कर सकता है?

क्या अल्लाह ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे वह उठा न सके? इस प्रश्न का उत्तर

यह अल्लाह के अस्तित्व के विरुद्ध तर्क नहीं, बल्कि नास्तिकों द्वारा उसकी सर्वशक्तिमत्ता और असीम सामर्थ्य पर संदेह पैदा करने वाली बौद्धिक उलझन है। प्रश्न होते हैं: “क्या अल्लाह ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे उठा न सके?”, “क्या अल्लाह दूसरा अल्लाह बना सकता है?” या “क्या अल्लाह अमुक काम कर सकता है?”, जहाँ काम स्वयं तार्किक रूप से असंभव होता है। उद्देश्य सामने वाले को उलझाना है:

  • “हाँ” कहें, तो अल्लाह सर्वशक्तिमान नहीं होगा, क्योंकि पत्थर उठा नहीं सकता।
  • “नहीं” कहें, तो भी सर्वशक्तिमान नहीं होगा, क्योंकि ऐसा पत्थर बना नहीं सकता।
    इस तरह उत्तर जो भी हो, निष्कर्ष निकाला जाएगा कि अल्लाह सर्वशक्तिमान नहीं।
    लेकिन थोड़ा विचार ही इस प्रश्न का छल खोल देता है। इसमें सामर्थ्य और सर्वशक्तिमत्ता की ग़लत परिभाषा पर आधारित तार्किक समस्या छिपी है।

क्या आइंस्टीन अयोग्य हैं?

प्रश्न में छिपे भ्रामक विचार को समझने के लिए आइंस्टीन और पत्रकार का काल्पनिक संवाद देखें:

अल्बर्ट आइंस्टीन

पत्रकार: क्या सच है कि आपका आईक्यू सामान्य औसत से अधिक है?
आइंस्टीन: मेरा आईक्यू 160 है, जो उन सत्तर प्रतिशत लोगों से काफ़ी अधिक है जिनका आईक्यू 70 से 130 के बीच है।
पत्रकार: आप आत्मविश्वासी लगते हैं, लेकिन दो छोटे प्रश्नों से साबित कर सकता हूँ कि उतने बुद्धिमान नहीं जितने दिखते हैं।
आइंस्टीन: यदि मुझमें आत्मविश्वास है, तो आप भी बड़े साहसी हैं। पूछिए, मैं तैयार हूँ।
पत्रकार: क्या साबित कर सकते हैं कि 1+1=3?
आइंस्टीन: नहीं, प्रश्न निरर्थक है। दशमलव पद्धति में 1+1=2 बुनियादी नियम है, जिस पर पूरा विज्ञान आधारित है।
पत्रकार: आपने नहीं कहा, तो उतने बुद्धिमान नहीं! दूसरा प्रश्न: क्या साबित कर सकते हैं कि त्रिभुज के कोणों का योग 180 डिग्री से अलग है?
आइंस्टीन: नहीं।
पत्रकार: लीजिए, साबित हो गया कि आप “असाधारण प्रतिभाशाली” कहलाने योग्य नहीं।

इस पत्रकार के बारे में क्या सोचेंगे—पागल, मूर्ख? कम से कम इतना करना चाहिए कि दो वर्ष उसे किसी का साक्षात्कार न लेने दें, ताकि प्राथमिक गणित फिर पढ़ सके।
आइंस्टीन के उत्तर न दे पाने से उनकी अयोग्यता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि प्रश्न ही अतार्किक है। 1+1 तीन कैसे हो सकता है? यह कहना भी उचित नहीं कि “आइंस्टीन 1+1=3 साबित नहीं कर सकते” क्योंकि यहाँ क्षमता की बात ही नहीं हो सकती; बात स्वयं असंभव है।

अल्लाह की क़ुदरत का संबंध तार्किक असंभवताओं से नहीं

शब्दार्थ के अनुसार सर्वशक्तिमान का अर्थ पूर्ण सामर्थ्य वाला है, न हर असंगत बात कर सकने वाला। वह सब कुछ कर सकता है, लेकिन “सब कुछ” में तार्किक असंभवता शामिल नहीं:“सर्वशक्तिमान होने का अर्थ तार्किक रूप से असंभव काम कर सकना नहीं है।” इसलिए ऐसे प्रश्न उठाने का आधार ही नहीं, क्योंकि अल्लाह की क़ुदरत तार्किक असंभवताओं से संबंधित नहीं। परिभाषा से ही अल्लाह हर चीज़ पर सक्षम है, इसलिए ऐसा पत्थर होना तार्किक रूप से असंभव है जिसे वह उठा न सके। “क्या वह ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे उठा न सके?” निरर्थक प्रश्न है। ऐसा पत्थर बनाना उसकी क़ुदरत के लागू होने का विषय नहीं, क्योंकि वह अपनी बनाई हर चीज़ को हिला सकता है।
अधिक स्पष्टता के लिए प्रोफ़ेसर साद रुस्तुम का उत्तर:

“निःसंदेह अल्लाह की क़ुदरत पूर्ण और असीम है। लेकिन वह तार्किक रूप से संभव चीज़ों से संबंधित है, असंभव से नहीं। असीम होने पर भी वह केवल उन चीज़ों पर लागू होती है जिनका अस्तित्व संभव है। असंभव से संबंधित न होना उसकी सीमा तय करना नहीं। कुछ उदाहरण लें: हम इन बिशपों और पादरियों से पूछें कि क्या अल्लाह अपने जैसा दूसरा ईश्वर बना सकता है? वे हाँ कहें, तो पूछेंगे: मख़लूक़ ईश्वर कैसे बनेगी? समय में सीमित होकर वह शाश्वत अल्लाह जैसी कैसे होगी?

वास्तव में “ईश्वर बनाना” कुतर्क और विरोधाभास है, क्योंकि कोई चीज़ एक ही समय मख़लूक़ और ईश्वर नहीं हो सकती। इसलिए उत्तर यही है कि अल्लाह की क़ुदरत का इससे संबंध नहीं, क्योंकि एक चीज़ का ईश्वर और उसका विपरीत दोनों होना निरर्थक तथा असंभव है। क़ुदरत असंभव चीज़ों पर लागू नहीं होती। दूसरा उदाहरण: क्या अल्लाह किसी को वास्तव में अपने अधिकार से बाहर निकाल सकता है? हाँ कहें, तो उसके अधिकार और प्रभाव को सीमित करते हैं। नहीं कहें, जो सही है, तो हमारी बात मानते हैं कि अल्लाह की क़ुदरत असीम है और असंभव पर लागू नहीं होती, क्योंकि किसी मख़लूक़ का अपने सृष्टिकर्ता के अधिकार और नियंत्रण से निकलना तार्किक रूप से असंभव है। तीसरा उदाहरण: एक नास्तिक ने मुझसे पूछा, ‘क्या तुम्हारा रब इतना बड़ा पत्थर बना सकता है कि स्वयं उठा न सके?’ मज़ाक़ में जोड़ा: ‘हाँ कहो, तो मानते हो कि तुम्हारा रब पत्थर उठाने में असमर्थ हो सकता है, इसलिए ईश्वर नहीं। नहीं कहो, तो मानते हो कि वह कुछ नहीं कर सकता, इसलिए ईश्वर नहीं।’ लेकिन दैवी क़ुदरत का ऐसे काल्पनिक पत्थर की रचना से संबंधित न होना अक्षमता नहीं दिखाता; उलटे उसकी क़ुदरत की पूर्णता सिद्ध करता है।”