एपिसोड 44 – विकासवाद को बनाए रखने का समर्थन कौन करता है?
टार्ज़न और रस्सियों के रूपक से विकासवाद के ऐतिहासिक प्रमाणों, जालसाज़ियों तथा उसे बनाए रखने वाले पेशेवर, आर्थिक और वैचारिक हितों की पड़ताल।
भूमिका: संयोग से विकास की मनगढ़ंत धारणा
टार्ज़न को हवा में लटके रहना ही है, लेकिन उसकी रस्सियाँ एक-एक करके टूट रही हैं। इसलिए उसे चौबीसों घंटे नई रस्सियाँ देनी होंगी, ताकि लटका रहे। संयोग से विकास की मनगढ़ंत धारणा का भी यही हाल है: रस्सियाँ टूटीं, प्रमाण निरस्त हुए, जालसाज़ियाँ खुलीं—लेकिन उससे पहले वे उसे लटकाए रख चुकी थीं। अनुयायी अब भी रस्सियाँ देते हैं ताकि वह गिर न जाए।
विकासवाद को गिरने से बचाने वाला कौन है और उसका क्या हित है? इस कथन की कहानी क्या है: “यह प्रमाण ग़लत निकला तो क्या, सिद्धांत के प्रमाण बहुत हैं”? जब विज्ञान जाली प्रमाणों की असलियत खोल देता है तो समस्या क्या है? क्या इससे उसी पश्चिमी विज्ञान की ईमानदारी सिद्ध नहीं होती जिसकी हम आलोचना करते हैं? इस एपिसोड में जानेंगे। हमारे साथ बने रहें।
(ध्वनि प्रभाव)
विकासवाद का जन्म 160 वर्ष पहले हुआ। उस समय के कथित प्रमाण और प्रस्तावित तंत्र देखें तो मालूम होगा कि आज उसके अनुयायी उनमें से बहुतों को ग़लत मानते हैं, फिर भी सिद्धांत को सही बताते हैं। क्यों? कहते हैं, बाद में बहुत-से नए प्रमाण मिले। यानी किसी क्षण सिद्धांत संकट से निकलकर ऐसा बन गया जिस पर सवाल या संदेह नहीं किया जा सकता। फिर अनुयायियों ने डार्विनवादी चश्मा पहनकर दुनिया की हर चीज़ देखने का अधिकार खुद को दे दिया।
वर्षों जिस प्रमाण से चिपके रहे, वह ग़लत निकले तो अपना परिचित वाक्य दोहराते हैं: “फिर भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, विकासवाद के प्रमाण बहुत हैं।”
आइए समय की पट्टी देखें। कुछ शीर्षक दोहराए जाएँगे, भाइयो, लेकिन उनके अंतर्गत इस एपिसोड के विषय से संबंधित नई जानकारी देंगे।
विकासवाद के कथित प्रमाण और उनका टूटना
आर्कियोप्टेरिक्स का जीवाश्म
डार्विन के जीवन में उनकी मनगढ़ंत धारणा को कई रस्सियाँ मिलीं। पहली: आर्कियोप्टेरिक्स का जीवाश्म, जो 1861 में जर्मनी में मिला। डार्विन और बाद के अनुयायियों ने उसके आधार पर पक्षियों के डायनासोर से विकसित होने का विचार बनाया। उसे सबसे मज़बूत प्रमाण और डायनासोर-पक्षी के बीच की कड़ी मानकर एक कथित समयरेखा दी।
फिर 140 वर्ष बाद, 2000 में, एक पक्षी का जीवाश्म मिला जिसने यह समयरेखा तोड़ दी। साइंस ने लिखा कि वह आर्कियोप्टेरिक्स से पहले का हो सकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने शीर्षक दिया: “जीवाश्म की खोज से पक्षियों के विकास के सिद्धांत को ख़तरा।” क्यों? डार्विनवादी कथा बैठाने के लिए पहले पक्षी का एक निश्चित समय में आना आवश्यक था। उन्होंने आर्कियोप्टेरिक्स को वही पक्षी बताया था, जिससे पहले कोई पक्षी नहीं होना चाहिए। अब उनकी अपनी गणना में उससे 7.5 करोड़ वर्ष पहले का पक्षी मिल गया।
खोजें जारी रहीं और 2011 में नेचर ने लिखा: “आर्कियोप्टेरिक्स अब पहला पक्षी नहीं।” आरंभ में ही कहा: “जीवाश्म के लक्षणों का विश्लेषण बताता है कि आर्कियोप्टेरिक्स पक्षी है ही नहीं।” सचमुच? अब जागे! डेढ़ सौ वर्ष बाद पता चला कि इस मनगढ़ंत धारणा का एक सबसे बड़ा सहारा ग़लत था?
तो नाराज़ क्यों? विज्ञान खुद सुधार रहा है, समस्या क्या है? बिल्कुल कोई समस्या नहीं—सिवाय इसके कि इसी ग़लती से डेढ़ सदी तक पीढ़ियों के मन में धारणा जमाई गई और पाठ्यपुस्तकों तथा वैज्ञानिक वेबसाइटों पर चित्र फैले। समस्या नहीं—सिवाय इसके कि रस्सी टूटने पर भी टार्ज़न नहीं गिरा, क्योंकि नई रस्सियाँ पकड़ चुका था। समस्या नहीं—सिवाय इसके कि अनुयायी सोए रहे या टूटना अनदेखा करते रहे और वैज्ञानिक खंडन के बाद भी दोहराते रहे। जैसे बच्चों के लिए 2015 की फ़िल्म: “स्वागत है, मैं पुराजीवविज्ञानी डॉ. स्कॉट हूँ और यह आर्कियोप्टेरिक्स है। आर्कियोप्टेरिक्स।” और समस्या नहीं—सिवाय इसके कि 2015 में भी पूछा गया: यह पक्षी, या प्राचीन पंख, कब रहता था? 14.5 करोड़ वर्ष पहले, यानी सही समय-सीमा में!
सीलाकैंथ मछली
आर्कियोप्टेरिक्स की रस्सी टूटने पर क्या धारणा का पतन स्वीकार करते हैं? नहीं। क्यों? “क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है जिसे हमारे सामने प्रस्तुत कर सको?” [अल-अनआम 6:148] हाँ, बहुत-से प्रमाण हैं। तो लाओ।
उन्होंने कहा: सीलाकैंथ मछली का जीवाश्म मिला। साफ़ है कि यह 40 करोड़ वर्ष पहले विकसित हुई और 6.6 करोड़ वर्ष पहले विलुप्त हो गई। इसलिए मछलियों और उभयचरों के बीच की संक्रमण-कड़ी है। साफ़ है कि समुद्र की सतह के पास रहती थी और दो फेफड़े थे। देखे? ये रहे। क्यों थे? ताकि उभयचर बन सके, जिनसे आगे सभी स्थलीय जीव निकलेंगे। इसके मांसल पंख पैरों की शुरुआत हैं।
फिर 1938 में सीलाकैंथ जीवित मिली, वह भी बहुत-सी! न करोड़ों वर्ष पहले विलुप्त हुई थी, न कुछ और। समुद्र की गहराइयों में थी, सतह के पास नहीं। दो वायु-थैलियाँ थीं, फेफड़े नहीं। सारे दावे निरस्त हुए और कथित संक्रमण-कड़ी का आधार टूट गया। नेचर ने लिखा: “आधी सदी के शोध बताते हैं कि सीलाकैंथ मछलियों और स्थलीय कशेरुकियों के बीच की अपेक्षित लुप्त कड़ी नहीं है।” इस तरह यह रस्सी भी टूटी, जैसे सरीसृपों और पक्षियों वाली रस्सी टूटी थी।
क्या टार्ज़न का गिरना स्वीकार किया? नहीं! कहा: सीलाकैंथ जीवित है? तो यह प्रमाण है कि करोड़ों वर्षों से इसका विकास रुक गया; समय इसे भूल गया। इसलिए यह जीवित जीवाश्म है, हमारे बीच विकास और हमारे सिद्धांत का जीवित प्रमाण! “यह सीलाकैंथ मछली जीवित जीवाश्म कही जाती है, सैकड़ों करोड़ नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों से जैसी की तैसी जीवित है। यह विज्ञान और विकासवाद में एक बड़ी उपलब्धि थी।”
अर्थात सीलाकैंथ विलुप्त हो तो विकास का प्रमाण, विलुप्त न हो तो भी प्रमाण! समुद्र की सतह के पास रहे तो प्रमाण, गहराई में निकले तो भी प्रमाण! फेफड़े हों तो प्रमाण, फेफड़े न हों तो भी प्रमाण! हाँ, हमें ऐसी व्याख्या करने का अधिकार है, क्योंकि विकास के प्रमाण बहुत हैं!
(ध्वनि प्रभाव)
हैकल के भ्रूणों के चित्र
सीलाकैंथ को संक्रमण-कड़ी न मानने से पहले टार्ज़न को एक और रस्सी दी जा चुकी थी: हैकल के चित्र, जो विभिन्न जीवों के भ्रूणों में बहुत समानता दिखाते थे। डार्विन बहुत प्रसन्न हुए। 1868 में यह रस्सी मिली: शुरुआती अवस्थाओं में भ्रूण समान हैं, इसलिए साझा मूल से हैं! समानता सही होती तब भी टेढ़ा तर्क था। लेकिन दावा सही भी नहीं था। भ्रूणविज्ञानियों के बहुत-से आरोपों के बाद 1909 में हैकल को म्यूनिख अल्गेमाइने त्साइटुंग में लेख लिखकर मानना पड़ा कि 6–8% चित्र जाली हैं। उन्होंने सफ़ाई देने की कोशिश की। लेकिन हैकल, सूक्ष्मदर्शियों ने 6–8% से कुछ अलग ही दिखाया, जैसा आप देखते हैं।
वैसे मुझे कैसे मालूम कि हैकल ने सचमुच माना? क्या मैं किसी की नकल कर रहा हूँ, जैसा तर्क से पूरी तरह चुक चुके और उत्तर देने में विफल लोग दोहराते हैं: “तुम ईसाई सृष्टिवादियों की बातें दोहराते हो”? नहीं, प्रिय लोगो। हमारे तर्क पर शोर मचाने के लिए कोई दूसरी बकवास खोजो। अल्लाह का शुक्र है, मैं यथासंभव पुष्टि करता हूँ, इस धारणा के तोतों की तरह नकल नहीं। मैंने जर्मनी के भाइयों से हैकल का मूल जर्मन लेख मँगाया। वे म्यूनिख पुस्तकालय गए, फिर लेख का इलेक्ट्रॉनिक लिंक पाया और मेरे लिए अनुवाद किया। अल्लाह उन्हें अच्छा बदला दे। पुष्टि के लिए लिंक टिप्पणियों में देंगे।
लौटें। हैकल ने बचते-बचाते स्वीकार किया। तो स्वीकार तो किया! नाराज़ क्यों? विज्ञान खुद सुधारता, मैल हटाता और तथ्य खोलता है। समस्या क्या? बिल्कुल कोई समस्या नहीं—सिवाय इसके कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों की “वैज्ञानिक” पुस्तकें इस स्वीकारोक्ति के बाद भी सौ वर्ष तक जाली चित्रों से प्रमाण देती रहीं। सौ वर्ष! शोध चित्रों को पूरी तरह झुठलाते रहे। “कशेरुकियों में अत्यधिक समान, विकास की दृष्टि से संरक्षित भ्रूणीय अवस्था नहीं है” शीर्षक शोध ने क्षेत्र के अनेक अध्ययनों की विस्तृत समीक्षा के बाद कहा: “हमारा शोध हैकल के चित्रों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठाता है।” वैज्ञानिक पुस्तकें गहरी नींद में रहीं और बाद में भी चित्र छापती रहीं। यह तेरह अलग पुस्तकों की सूची है जिन्होंने हाल तक उन्हें छापा।
केवल हाल के वर्षों में चित्र गायब होने लगे। उनकी जगह भ्रूणीय प्रमाण की रिक्ति भरने को नई रस्सी दी: मछली और मानव भ्रूण के कुछ चाप समान हैं, इसलिए साझा मूल है। जानकारी के लिए, भाइयो: मछली में यही चाप आगे पानी में साँस लेने के गलफड़े बनते हैं; मनुष्य में सुनने के लिए कान की संरचनाएँ और रक्त-कैल्शियम नियंत्रित करने वाली पैराथायरॉइड ग्रंथि बनते हैं। कार्य में इन संरचनाओं का दूर-दूर तक संबंध नहीं। फिर भी बाहरी समानता उनके लिए साझा मूल का प्रमाण है। हाँ, भ्रूणीय प्रमाण की जगह भरनी है, खाली नहीं छोड़नी। अल्लाह जाने कितने समय इस मज़ाक पर सोए रहेंगे, फिर इसे भी पुस्तकों से हटाएँगे।
तो नाराज़ क्यों? समस्या क्या है? कोई नहीं—सिवाय इसके कि हैकल के चित्रों की यह सच्चाई सामने रखो तो उस समय राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा संस्थान की कार्यकारी निदेशक डॉ. यूजिनी स्कॉट जैसा उत्तर मिलता है। वह कहती हैं: “क्या इससे भ्रूणविज्ञान और विकास के संबंध की हमारी जानकारी बदलती है? ज़रा भी नहीं। क्योंकि हैकल के चित्रों की बुनियादी अवधारणाएँ समकालीन और पुराने शोधों से समर्थित हैं।” यानी यह प्रमाण सही न हो तो भी बहुत-से दूसरे प्रमाण हैं। विकास तथ्य है, संदेह नहीं, प्रमाण बहुत हैं—स्पष्ट है! इसीलिए विज्ञान जिसे निरस्त कर चुका, उससे इतने समय तक अपनी धारणा के समर्थन में चिपके रहे।
रॉबर्ट वीडर्सहाइम की अवशेषी अंगों की सूची
डार्विन इस संतोष के साथ मरे कि टार्ज़न के पास रस्सियाँ हैं। फिर जर्मन शरीर-रचनाविद रॉबर्ट वीडर्सहाइम ने एक और रस्सी दी। 1893 में 86 ऐसे अवशेषी अंगों की सूची छापी जिन्हें वे अनुपयोगी समझते थे। यह सूची एक-एक करके ढह गई, जैसा पहले समझाया।
तो नाराज़ क्यों? विज्ञान ने सूची निरस्त कर दी। लेकिन सूची, हैकल के चित्र और आर्कियोप्टेरिक्स की संक्रमण-कड़ी निरस्त होने से पहले लंबे वर्षों में—ध्यान दें, सब जर्मनी में—ये “वैज्ञानिक” जर्मनी में इन्हीं प्रमाणों से डार्विन की धारणा फैलाते रहे। बहुत-से जर्मनों ने स्वीकार किया, जिससे हिटलर की “माइन काम्फ़” में आर्य जाति की श्रेष्ठता फैलाने की ज़मीन बनी। उसने युद्ध किए जिनमें लाखों मरे और आनुवंशिक सुधार के यूजेनिक्स अभियान चलाकर बहुतों को मारा। विकास के पागलों की दृष्टि में कम विकसित इस बेचारे शिकार की आँखें त्रासदी कहती हैं। कैलिफ़ोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय के इतिहास प्रोफ़ेसर रिचर्ड वाइकार्ट ने “हिटलर्स रिलिजन” में प्रमाण दिए कि नाज़ीवाद ने विकासवाद को प्रोत्साहन और समर्थन दिया।
हाँ, विज्ञान टार्ज़न की जाली रस्सियाँ, जैसे हैकल के भ्रूण, और अज्ञान पर बनी रस्सियाँ, जैसे वीडर्सहाइम की सूची, काटता है। लेकिन उससे पहले वे इस धारणा की सेवा और मानवता के विनाश में कितनी इस्तेमाल हो चुकी होती हैं!
पिल्टडाउन मानव की खोपड़ी
पिल्टडाउन मानव की खोपड़ी 1912 में मिली रस्सी थी, जो 1953 में वैज्ञानिक समाज को जालसाज़ी पता चलने पर टूटी। इन 41 वर्षों में नेचर के अनुसार उस पर कितने शोध और टिप्पणियाँ प्रकाशित हुए? पाँच सौ से अधिक। लिंक पर शीर्षक देखें: पिल्टडाउन खोपड़ी के जबड़े का विश्लेषण, उसके पहले और दूसरे निचले दाढ़ का विश्लेषण। कोई एक शोध लिखता और 105 दूसरे शोधों का संदर्भ देता। खेल है, साथियो, सचमुच बच्चों का खेल! जाली खोपड़ी पर पाँच सौ से अधिक शोध और टिप्पणियाँ।
भाइयो, याद दिलाते रहना होगा कि संक्रमणकालीन जीवाश्म का विचार ही बहुत हास्यास्पद है, जैसा “उनसे बच्चों की तरह बात करो” और “दस लाख किसने चुराए?” में विस्तार से बताया। बहुत रियायत दें तब भी इस धारणा के लिए धरती पर और धरती के भीतर अनगिनत संक्रमणकालीन जीव चाहिए। ऊपर से इसमें जीवों को फ़ोटोशॉप या गूँथे हुए आटे जैसा मानकर आनुवंशिक कूट, आंतरिक तंत्रों और कोशिकाओं की बनावट के अंतर अनदेखे किए जाते हैं। सबसे बढ़कर परिवर्तन में उद्देश्य के उनके इनकार को भूलते हैं। कोई जीव को दूसरे में बदलना चाहता नहीं, जैसा क्रमिक रेखाएँ भ्रम देती हैं; जीव हर दिशा में अंधाधुंध चलता है। तब पिल्टडाउन जैसी खोपड़ी या आर्कियोप्टेरिक्स जैसे जीवाश्म को पकड़कर इतनी छानबीन करना कितना हास्यास्पद है, मानो उससे उनकी धारणा सही हो जाएगी।
नेब्रास्का का कथित मानव
पिल्टडाउन की रस्सी के रहते 1922 में एक दाढ़ के आधार पर नेब्रास्का मानव की रस्सी दी गई। 1927 में सूअर की दाढ़ निकली तो टूट गई। लेकिन तब तक? इस दाँत ने कई अमेरिकी राज्यों के स्कूलों में डार्विन की धारणा पढ़ाना शुरू कराने में मदद कर दी थी। सूअर के दाँत का तमाशा खुला तो क्या धारणा पुस्तकों से हटाई? बिल्कुल नहीं; यह प्रमाण गिरा तो भी बहुत-से प्रमाण हैं। एक और देखें।
रामापिथेकस
पिल्टडाउन और नेब्रास्का की रस्सियाँ टूटने के बाद एक जबड़ा मिला। मान लिया कि मानव और पशु पूर्वजों के बीच की कड़ी है, रामापिथेकस नाम दिया और जबड़े के आधार पर पूरा चित्र बना दिया। टार्ज़न 1980 के दशक की शुरुआत तक लटका रहा। फिर मनुष्य से संबंध नकारने वाले शोध बहुत हुए तो इसका नाम लेना छोड़ दिया।
लूसी का जीवाश्म
लेकिन 1974 में, रामापिथेकस की रस्सी टूटने से पहले, लूसी की रस्सी दे चुके थे। उसे अर्द्धमानव बताकर गूँजता वैज्ञानिक नाम दिया: ऑस्ट्रैलोपिथेकस अफ़ारेंसिस। तीस वर्ष से अधिक बाद इस रस्सी का टूटना ऐसे शोधों से शुरू हुआ जिनके लेखक खुद इस धारणा के डॉक्टर थे और कहते थे कि उनका शोध लूसी की मानव-पूर्वज की भूमिका पर संदेह उठाता है। “अल-बाहिथून अल-मुस्लिमून” का “गूगल और लूसी का जीवाश्म” लेख इसके प्रमाण-प्रयोग में जालसाज़ी और धोखे का विस्तार बताता है।
राइनर फ़ॉन त्सीटेन की जालसाज़ियाँ
लूसी की रस्सी के एक वर्ष बाद, 1975 में, जर्मन मानव-उत्पत्ति प्रोफ़ेसर राइनर फ़ॉन त्सीटेन ने तीस वर्ष तक अनेक खोपड़ियों से रस्सियाँ दीं। उन्हें मानव और पशु-पूर्वजों की संक्रमण-अवस्थाएँ बताया। किताबें उनके काम से भर गईं। फिर फ़्रैंकफ़र्ट विश्वविद्यालय की समिति ने तीस वर्ष के कथित प्रमाणों में जालसाज़ी का दोषी ठहराया। ख़बर विश्व की वेबसाइटों पर फैली। वे अपना लाभ भी नहीं भूले थे: कथित विकास-प्रमाण वाली चिंपैंज़ी खोपड़ियाँ बेचने का समझौता किया। मानो कहते हों: आओ, अपने पुराने बाप-दादाओं की खोपड़ियाँ ख़रीदो! जैसे चर्च के लोग पापमुक्ति-पत्रों की कहानी पर लोगों के विश्वास से लाभ उठाते थे।
आर्कियोरैप्टर पक्षी
राइनर की रस्सियों के दौरान 1999 में आर्कियोरैप्टर की रस्सी दी गई। नेशनल जियोग्राफ़िक ने आवरण-चित्र बनाया और जीवाश्म अस्सी हज़ार डॉलर में बिका। 2001 में रस्सी टूटी: नेचर ने प्रकाशित किया कि जीवाश्म जाली है।
आइडा का जीवाश्म
राइनर और लूसी की रस्सियाँ टूटने के बाद टार्ज़न आइडा से लटका। नॉर्वे के डॉ. योर्न हुरूम ने दस लाख डॉलर में खरीदा और 4.7 करोड़ वर्ष पहले जीने वाला प्रारंभिक मानव-पूर्वज कहकर प्रचार किया। डार्विन की स्मृति में गूँजता नाम दिया: डार्विनियस मासिले। मीडिया ने आठवाँ अजूबा कहा। गूगल ने उत्साह में अपना लोगो आइडा का बनाया; ब्रिटिश बीबीसी और अमेरिकी हिस्ट्री चैनल ने “द लिंक”, यानी “कड़ी”, नाम की डॉक्यूमेंट्री बनाई। फिर नेचर ने मानव-संबंध नकारकर इसे लीमर का पूर्वज होने के अधिक निकट बताया। भाइयो, बच्चा ऐसी हड्डी लाए तो कहें: बेटा, फेंको और हाथ अच्छी तरह धोओ। उसी पर टार्ज़न के अनुयायी इतना शोर, खोजें और डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं! जल्द समाचार साइटों ने आरोप लगाया कि हुरूम ने खर्च की गई रकम वसूलने के लिए जानबूझकर जीवाश्म का तमाशा बनाया।
ओर्से का कथित मानव
1984 में खोपड़ी के टुकड़े पर ओर्से मानव की रस्सी दी गई। 1997 में छोटे गधे की खोपड़ी निकली तो टूट गई। टॉक ऑरिजिन्स ने इस हास्यास्पद घटना पर कहा: “जीवाश्मों की स्थिति जो हो, मानव-विकास के बाकी प्रमाणों की सत्यता प्रभावित नहीं होती।” यानी हमेशा की तरह बहुत-से प्रमाण हैं!
व्हेल की पिछली हड्डियाँ
ओर्से की रस्सी टूटने से पहले 1989 में व्हेल की पिछली हड्डियों की रस्सी दी गई, जो 2014 में टूटी। “अब जागे?” एपिसोड में इस कांड का विस्तार बताया।
पूँछ वाले बच्चे की तस्वीर
चिंता मत करो, उसी वर्ष दूसरी रस्सी मिली। बायोलोगोस फ़ाउंडेशन के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. कार्ल गिबर्सन व्याख्यान में पूँछ वाले बच्चे की तस्वीर दिखाते हैं: “कुछ बच्चों में ऐसा होता है। कुछ बच्चे पूँछ लेकर जन्मते हैं। हमारे पास पूँछ बनाने वाले जीन हैं।” इसे मनुष्य के पशु-मूल से विकसित होने का प्रमाण मानते हैं और कहते हैं कि पूँछ के जीन कुछ लोगों में ही काम करते हैं। लेकिन बताया गया कि तस्वीर जाली, फ़ोटोशॉप की बनी है, मूल क्रैक्ड डॉट कॉम नाम की हास्य वेबसाइट पर है। और जिसे कुछ लोगों में सक्रिय पशु-पूर्वजों का पूँछ-जीन कहते हैं, वह वास्तव में कोशिका-वृद्धि नियंत्रित करने वाला जीन है, जिसकी हर मनुष्य को ज़रूरत है। शर्म नहीं आती, गिबर्सन? फ़ोटोशॉप, तथ्यों में झूठ, हर चीज़ में गड़बड़ी—शर्म नहीं आती?
डॉ. गिबर्सन ने क्या जवाब दिया? तस्वीर से धोखा खा गए, लेकिन उसका सिद्धांत दूसरी सही तस्वीरों से सिद्ध है। यानी यह सही न हो, फिर भी बहुत-से प्रमाण हैं। कहाँ हैं दूसरे प्रमाण? उनके पास जाओ तो मरीचिका ही मरीचिका।
कथित कबाड़ डीएनए
बहुत-सा डीएनए बेकार कबाड़ है—यह एक और मूर्खतापूर्ण रस्सी दी गई। 2012 में जीनोम परियोजना प्रकाशित होने पर टूटी और उसका उल्लेख छोड़ दिया गया।
तो नाराज़ क्यों? ग़लती सुधर गई। अच्छा, लेकिन कब? ब्राउन विश्वविद्यालय के जीवविज्ञानी केनेथ मिलर ने डोवर मुक़दमे के पहले ही दिन कबाड़ डीएनए का दावा किया था। पिछले एपिसोड की वह अदालत याद है, भाइयो, जो उस स्कूल के विरुद्ध लगी थी जो पढ़ाना चाहता था कि जीवन किसी कर्ता की अभिकल्पना से आया हो सकता है, यादृच्छिक संयोगों से नहीं? अभिभावक बोर्ड दोषी ठहरा और विकास के देवताओं के विरुद्ध उठने वालों के लिए उदाहरण बना। विकास के समर्थन और अभिकल्पना के विरोध में मिलर ने कहा कि डीएनए के भाग टूटे, त्रुटिपूर्ण, कार्यहीन और बस बेतरतीब गड़बड़ हैं। निर्णय के नौ वर्ष बाद जीनोम परियोजना ने दावे निरस्त किए। क्या फिर स्कूल को ब्रह्मांड में अभिकल्पना और कम-से-कम विकास के संदिग्ध होने की शिक्षा की अनुमति मिली? नहीं, क्योंकि कबाड़ डीएनए गिर भी जाए तो बहुत-से प्रमाण हैं। कहाँ? जाते हैं तो मरीचिका में मरीचिका, जिसे विज्ञान खोल देता है। लेकिन कब? धारणा दशकों जीवित रह चुकी, नई पीढ़ियों के शिकारों में जम चुकी और प्रमाण अपना काम पूरा करके बेकार हो चुका होता है।
“टार्ज़न-पद्धति” और ग़लतियों की सफ़ाई
तुम कहोगे: दूसरे विज्ञानों में भी ग़लतियाँ सुधरीं और लोगों ने लाभ पाया। मैं कहूँगा: वे उपयोगी विज्ञान हैं, जो बुद्धि, फ़ितरत और इंद्रिय-बोध से विरोध पर नहीं बने। विकासवाद की धारणा इनके विरुद्ध पैदा हुई और पूरी तरह अनुपयोगी रही, जैसा पहले दिखाया। भाई, सौ वर्ष पहले, या कुछ आगे-पीछे के युवक की जगह खुद को रखो। उससे भी कहते थे, जैसा तुमसे कहते हैं: बहुत-से प्रमाण हैं। आज देखो: खुद अनुयायियों के स्वीकार के अनुसार टूटी रस्सियाँ!
कहोगे: समर्थक जिन्हें छोड़ चुके, उनकी बात क्यों? आज के प्रमाणों पर बोलो। यहाँ मैं टार्ज़न-पद्धति दिखा रहा हूँ: एक रस्सी टूटे तो नई दे दो। आज की रस्सियाँ तो पिछले एपिसोडों में काट चुके। संभव है दस या बीस वर्ष बाद किताबों में वे न मिलें, लेकिन तब तक नई रस्सियाँ मिल जाएँगी। सिलसिला यही है।
हाँ, पिछले एपिसोडों में बहुत-से समर्थकों के अपने शोधों से रस्सियाँ काटीं: आँख के रेटिना की डिज़ाइन-त्रुटियाँ—काटीं; अपेंडिक्स; बेकार पंख वाले पक्षी—काटीं; साँप की पिछली हड्डियाँ; निएंडरथल मानव; जीवों में समानता; मानव-चिंपैंज़ी जीनोम की 99% समानता—काटीं; 99% वैज्ञानिक विकास मानते हैं; सिद्धांत उपयोगी, अनिवार्य, लोगों का उपचार करता है, रसायन का नोबेल पुरस्कार; एंटीबायोटिक के प्रति जीवाणु-प्रतिरोध; लेन्स्की का प्रयोग औरसाइट्रेट पचाने वाले जीवाणु—काटी, और भी काटीं। “अल-बाहिथून अल-मुस्लिमून” के भाइयों ने आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित सैकड़ों लेखों में सैकड़ों और रस्सियाँ काटीं।
इसके बाद: “क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है जिसे हमारे सामने प्रस्तुत कर सको?” [अल-अनआम 6:148] तुम्हारा ठोस प्रमाण कहाँ है जो सही बुद्धि और सम्मानजनक वैज्ञानिक शोध की सुई लगते ही पिचक न जाए? सुदृढ़, सुसंगत प्रमाण कहाँ है? खोखली चकाचौंध में? तथ्य और मनगढ़ंत धारणा मिलाने में? अज्ञान को प्रमाण बनाने में? खोखले नामों में? लोगों से बच्चों की तरह बात करने में? समानता और अस्पष्टता के सहारे में? हवा-हवाई बकवास और अज्ञात संदर्भ में? अब तक बताई चौदह तार्किक भ्रांतियों और मानसिक चालों में? आज पंद्रहवीं जोड़ते हैं: टार्ज़न-पद्धति।
“कह दो: क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है जिसे हमारे सामने प्रस्तुत कर सको? तुम तो केवल अनुमान के पीछे चलते हो और केवल अटकलें लगाते हो।” हमें वास्तविक ज्ञान चाहिए, छद्मविज्ञान, फ़ोटोशॉप और भोले लोगों को छलने वाली हॉलीवुड फ़िल्में नहीं। श्रृंखला “यदि सच्चे हो तो अपना प्रमाण लाओ” [अल-बक़रा 2:111] से शुरू की और समापन के निकट भी यही है। क़ुरआनी पद्धति ज्ञान और प्रमाण की है, कल्पना और मनगढ़ंत धारणाओं की नहीं। अल्लाह का शुक्र है, हमारा धर्म स्पष्ट आधारों और ठोस, सुसंगत, स्वतंत्र प्रमाणों पर है। उन्हीं से अस्पष्ट बातों की व्याख्या करते हैं तो व्यवस्था में संगति आती है। तुम्हारे डार्विनवादी धर्म में एक स्पष्ट आधार या ठोस स्वतंत्र प्रमाण कहाँ है? क्या तुम फितना पैदा कर लोगों को भटकाने के लिए हमारे धर्म की अस्पष्ट बातों के पीछे नहीं पड़ते और स्पष्ट आधारों से दूर नहीं रखते? खुद अस्पष्टता, भ्रम और मनगढ़ंत बातों के सिवा क्या देते हो? “कह दो: क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है जिसे हमारे सामने प्रस्तुत कर सको?”
हदीस-विद्वानों की सुंदर बात है: किसी हदीस की सभी सनदों में गढ़ने वाले, झूठे और दुराचार के आरोपी हों, तो सनदें अधिक होने से वह और कमज़ोर तथा अस्वीकार्य होती है; एक दूसरी को मज़बूत नहीं करती। एक गढ़ता, दूसरा चुराता, तीसरे को झूठ और उसका अनोखापन पसंद आता तो लोगों को बताता है। टार्ज़न का भी यही हाल है। अनुयायियों की कमज़ोर रस्सियाँ बताती हैं कि सीधे, सुदृढ़, सुसंगत प्रमाण न होने से वे झूठों की बाढ़ लाते हैं, जैसे पुराने लोगों ने कहा: “इस क़ुरआन को मत सुनो और इसके पढ़े जाने पर शोर करो, शायद तुम ग़ालिब आ जाओ।” [फ़ुस्सिलत 41:26]
याद रखें, भाइयो: रस्सियाँ काटने के साथ यह भी दिखाया कि जो जाली नहीं, वे वास्तव में सृष्टि की महानता, शक्ति, हिकमत और उत्कृष्टता के प्रमाण हैं—साइट्रेट पचाने वाले जीवाणु, पेंगुइन के पंख, आँख की अभिकल्पना, समान आनुवंशिक पदार्थ के साथ जीवों की विविधता और बहुत-से उदाहरण। हमने कथित प्रमाणों के सिद्धांत जड़ से काटने की कुंजियाँ पाईं। बेकार अंगों के विचार का खंडन और उत्तर बताया: वे अज्ञान को प्रमाण बनाते हैं, प्रमाण का भार उन्हीं पर है। जीवाश्मों वाले पूरे विचार की हास्यास्पदता और उन्हें सिद्धांत के परिणामों का सामना कराने का तरीका “दस लाख किसने चुराए?” में बताया। यादृच्छिक उत्परिवर्तन की क्षमता का अर्थ और हास्यास्पदता “उनसे बच्चों की तरह बात करो” में बताई। समानता, अज्ञात संदर्भ और दूसरे सिद्धांतों की जड़ काटी। अब नई रस्सी सुनकर सही छल-श्रेणी में रख दो; बैठने का ढंग बदलने या उठने की ज़रूरत नहीं। आराम से वैज्ञानिक ढंग से रस्सियाँ काटो और सूर्य छिपाने वाले गुब्बारे पिचकाओ। धोखा देने वाले आएँ तो कहो: “हम तुम्हारा विश्वास नहीं करेंगे; अल्लाह हमें तुम्हारी ख़बरें बता चुका है।” [अत-तौबा 9:94] हमने पहले की गुमराही और उनकी आम तार्किक भ्रांतियों पर क़ुरआन की चेतावनी देखी है।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने कहा: “फ़ितने दिलों पर चटाई की तीलियों की तरह एक-एक करके प्रस्तुत होते हैं। जो दिल उन्हें अपना ले, उसमें काला बिंदु लग जाता है; जो ठुकराए, उसमें सफ़ेद बिंदु। अंत में दो प्रकार के दिल हो जाते हैं: सफ़ेद, चिकने पत्थर जैसा, जिसे आकाश और धरती के रहते कोई फ़ितना हानि नहीं पहुँचाता; और दूसरा काला, धूसर, उलटे प्याले जैसा, जो न भलाई पहचानता न बुराई ठुकराता, सिवाय उस इच्छा के जिसे अपना चुका हो।” (सहीह मुस्लिम) अल्लाह से दुआ है हमें और आपको सफ़ेद दिल वाला बनाए, ज्ञान और मार्गदर्शन का अनुयायी, मनगढ़ंत बात और इच्छा का नहीं। जब तक आकाश-धरती हैं, न फ़ितना, न संदेह, न छद्मविज्ञान हानि दे। बल्कि भाई, इन एपिसोडों के बाद केवल उनके गुब्बारों और रस्सियों का उत्तर देना पर्याप्त न समझो; लोगों को इन धोखेबाज़ विक्रेताओं से सावधान करो, जो सड़े हुए छद्मविज्ञान के डिब्बे बेचते हैं।
टार्ज़न-पद्धति की समस्याओं का सार: वैज्ञानिक शोध से रस्सी टूटने के बाद भी पाठ्यपुस्तकें और राजनीतिक मीडिया उससे लंबे समय चिपके रहते हैं। एक-एक रस्सी टूटने पर भी समर्थक पतन नहीं मानते, तोते की तरह कहते हैं: “फिर भी प्रमाण बहुत हैं।” सच यह है कि बहुत-से झूठ लगातार गढ़े जाते हैं। रस्सी पीढ़ियों के मन, आस्था और नैतिकता दूषित करने और मानवता के विरुद्ध अपराध में इस्तेमाल होने के बाद टूटती है।
“विकासवाद” को बनाए रखने का समर्थन कौन करता है?
प्रश्न बचता है: टार्ज़न को रस्सियाँ कौन और क्यों देता है? 99% वैज्ञानिक मानते हैं—इस दावे का पिछले एपिसोड में विस्तार से उत्तर दिया। आज प्रश्न है: वास्तव में समर्थन कौन करता है और गिरने से बचाने को रस्सियाँ कौन देता है? कई प्रकार के लोग:
पेशेवर लाभ पाने वाले
पहले वे जिनका पेशेवर जीवन इस पर निर्भर है। टार्ज़न-पद्धति ने बहुत-से ऐसे अकादमिक पैदा किए जिनकी उपाधियाँ, डिग्रियाँ, पेशा, वेतन और पद इसी के हवा में लटके रहने पर निर्भर हैं। सोचिए, विकासवादी जीवविज्ञान के विशेषज्ञ से कहें: सिद्ध हो गया कि तुम्हारी विशेषज्ञता का सही नाम “मनगढ़ंत जीवविज्ञान का डॉक्टर” है। प्रतिक्रिया क्या होगी?
उपयोगी ज्ञान पैदा करने में विफल लोग
दूसरे: उपयोगी ज्ञान पैदा करने में हर विफल व्यक्ति, जिसकी चित्रकारी की कल्पना जबड़े, दाढ़, खोपड़ी के हिस्से या पसली से अर्द्धमानव बना दे, रस्सी देगा। उपयोगी ज्ञान में विफल लेकिन व्यापक हास्यपूर्ण कल्पना से इंद्रियों या मानसिक प्रवृत्तियों का यादृच्छिक उत्परिवर्तन और अंधे चयन से बनना चित्रित करने वाला भी रस्सी देगा। ऐसे हज़ारों शोध मिलेंगे जो अपने काग़ज़ की कीमत के भी नहीं।
चित्रों और फ़िल्मों के निर्माता
तीसरे: फ़ोटोशॉप चित्रों और हॉलीवुड फ़िल्मों से मन में धारणा जमाने वाले सभी डिज़ाइनर, निर्माता और निर्देशक रस्सी देंगे।
अवसरवादी और हड्डियों के व्यापारी
चौथे: किसी समाज में मनगढ़ंत धारणाओं के फैलने की ख़बर सुनकर हड्डियाँ जमा और जोड़कर बेचने वाला हर अवसरवादी रस्सी देगा, जैसे प्रोफ़ेसर राइनर और दूसरे हड्डी-विक्रेता। मामला व्यापार बन चुका, जैसा हुरूम और आर्कियोरैप्टर में देखा।
छद्मविज्ञान के पुजारी
पाँचवें: छद्मविज्ञान का हर पाखंडी पुजारी जिसकी “ईश्वर भ्रम है” और “ब्रह्मांड शून्य से स्वयं बना” कहने वाली किताबों की हज़ारों-लाखों प्रतियाँ छपती हैं। इसके लिए विज्ञान बिगाड़ता, जनता के अज्ञान का लाभ लेकर झूठ और बकवास बेचता, धन और शोहरत कमाता है। वह रस्सी देगा।
हाँ, 160 वर्ष में इस टार्ज़न-पद्धति ने ऐसे लाभार्थी बनाए जो इससे लटके हैं और यह उनसे। समर्पित सैनिक रस्सियाँ देंगे और गिरने नहीं देंगे, क्योंकि इसका गिरना उनका गिरना है। बहुतों को इस मनगढ़ंत मूर्ति की सेवा के अलावा कुछ नहीं आता, रोटी भी उसी से मिलती है। संबंध किसी आधार-बिंदु के दोनों ओर लटकती रस्सी का है: टार्ज़न उन पर, वे टार्ज़न पर निर्भर; एक गिरे तो दूसरा भी। कुछ के लिए उसे गिराना मतलब सड़क पर रात बिताना और “बेघर” की तख़्ती उठाना है।
तो समझाएँ कि यह विज्ञान में जालसाज़ी और लोगों को भटकाने से अधिक सम्मानजनक है। अल्लाह पर भरोसा, लोगों से बढ़कर सत्य, वैज्ञानिक ईमानदारी समझाएँ। भूल गए? विकासवादी के लिए ये अर्थ कुछ नहीं: मानव नामक इस रासायनिक कचरे में यादृच्छिक उत्परिवर्तन से आए संयोगजनित भाव हैं। हँसी आती है कि युवा धर्म-व्यापारियों—जो सचमुच हैं—से घृणा करके इन मनगढ़ंत धारणा के व्यापारियों पर भरोसा करते हैं, मानो वे वैज्ञानिक ईमानदारी से अल्लाह की प्रसन्नता के लिए तथ्य देंगे।
इस पर निर्भर लोगों की मानसिक दशा बुद्धि को निश्चित रास्तों से निकलने नहीं देती। विकासवाद के ग़लत होने पर सोचना भी मना है! टार्ज़न के बिना भविष्य की अँधेरी तस्वीरें मन को मुक्त करने से रोकती हैं। दूसरी जाहिली दासताएँ जैसी दासता है। पूर्वजों ने मूर्ति बनाई; राह पर चले तो आजीविका उस पर निर्भर मिली। इस दासता से निकल नहीं सकते या चाहते नहीं। नए पुजारी बन गए: मूर्ति रहे, उपलब्धियाँ और चमत्कार उससे जोड़े जाएँ, हालाँकि वह उनमें है जो “एक मक्खी भी नहीं पैदा कर सकते, चाहे सब उसके लिए इकट्ठे हो जाएँ।” [अल-हज्ज 22:73] फिर भी रहना आवश्यक है, ताकि लोग उसके बर्तन में धन डालें और पुजारी उठाएँ।
निक्सन शॉक में सोने और डॉलर का संबंध टूटने के बाद दुनिया ऐसी ही हुई। सबकी रस्सियाँ अमेरिका तक हैं, क्योंकि उसका गिरना उनका आर्थिक पतन और उनका गिरना उसका पतन है। हर कोई दूसरे को रस्सी देता है। भ्रष्ट राष्ट्रपतियों के दरबारी पूरी जान से रक्षा करते हैं, क्योंकि उसका अस्तित्व उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न है: वह गिरे तो वे, वे गिरें तो वह। सब एक-दूसरे को रस्सी देते हैं। पुरानी और नई जाहिलियतें आम तौर पर ऐसी हैं। अल्लाह पर ईमान अलग है: रस्सी अल्लाह की ओर से लोगों तक है, और उसे उनकी ज़रूरत या उन पर निर्भरता नहीं। सभी प्राणी उसकी रस्सी के मोहताज हैं। इस अर्थ पर विचार करते हुए पढ़ें: “और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और अलग-अलग न हो।” [आल इमरान 3:103]
धर्म से समस्या रखने वाले
क्या केवल लाभार्थी और विफल लोग समर्थन करते हैं? नहीं, रस्सी देने वाले दूसरे भी हैं। छठे: चर्च से समस्या रखने वाला जो दूसरा सच्चा धर्म खोजना नहीं चाहता; उसके लिए दो ही विकल्प हैं, चर्च या विकासवाद। इसी तरह ईमान से मानसिक समस्या रखने वाला, या इच्छा को अपना पूज्य बनाना चाहने वाला, जो खुद को पशुवत वासना के बजाय वैज्ञानिक आधार पर सुसंगत दिखाना चाहता है, रस्सी देगा।
“सूक्ष्मजीवों के उपासक” में बताया कि “इवोल्यूशन” अब ठीक “सायास, इच्छापूर्वक सृष्टि नहीं” के बराबर है। उसे अर्थ, यादृच्छिकता और अंधेपन से खाली कर दिया; अनुयायी घोर असहमत हैं, लेकिन सृष्टि के इनकार पर एक हैं। “नास्तिकों की रिक्तियों का ईश्वर” और “अपहृत बालक” में बताया कि संयोगवादी विकास के आधार भौतिकवाद का वायरस नास्तिकता का नकाब है। “वैज्ञानिकों” के कथन दिए: व्याख्याएँ जितनी भी बेतुकी, बुद्धि और तर्क के विरुद्ध हों, स्वीकार करनी होंगी ताकि धर्म वापस न आए। विकासवाद नास्तिक धर्म है, शब्द के पूरे अर्थ में धर्म। अनुयायी उसकी रक्षा और रस्सियाँ देते हैं, जैसे कोई अपने धर्म की रक्षा करता है।
राज्य और संस्थानों का समर्थन
इसमें राज्य का समर्थन जुड़ा। अमेरिका की जैविक विज्ञान पाठ्यक्रम अध्ययन संस्था बीएससीएस को अनुदान मिला, जिसका उपयोग 1963 से पाठ्यपुस्तकों में विकासवाद की अवधारणाएँ भरने में किया। उनके लिए स्थान दस गुना से अधिक हुआ, धर्मनिरपेक्ष संविधान से अनुकूलता बताकर: सृष्टि धर्म है, विकास विज्ञान। जबकि “विवाद पढ़ाओ” आंदोलन ने माँगा कि छात्रों को आपत्तियाँ भी बताई जाएँ, ताकि खुद सोचकर विश्वास बनाएँ; संविधान शोध की स्वतंत्रता भी देता है। जनमत-सर्वेक्षणों में भारी समर्थन के बावजूद टार्ज़न के अनुयायी हावी हैं। “अमेरिकन एथीइस्ट्स” जैसी संस्था भी बनी, जिसे उन्मुक्त यौनाचार की समर्थक मैडलिन ओहेयर ने 1963 में स्थापित किया। विकास के देवताओं के विरुद्ध उठने वाले अकादमिकों का अदालत में पीछा करती है। नास्तिक बहुमत वाली राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी भी है, जिसके तथ्य-विकृतियों के उदाहरण देखे। पूरे संस्थान इस धारणा का समर्थन करते हैं!
लेकिन ठहरो! क्या इससे इतनी व्यापकता समझ आती है? तुम्हारे प्रश्न का उत्तर यह है: क्या केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से दिखने वाला वायरस मनुष्य के शरीर में फैलकर उसे मार सकता है? हाँ, यदि प्रतिरक्षा कमज़ोर हो। यह वायरस भी चर्च की मनगढ़ंत धारणाओं से थके, उनसे उकताए और प्रभुत्व से पिसे पश्चिम के शरीर में फैला। टार्ज़न ने विरोधी की विफलता पर झूठा गौरव बनाया, इस कहावत की तरह: हमारे देश में कमज़ोर पक्षी भी बाज़ बनता है। जैसे भ्रष्ट व्यवस्थाएँ जनता को ऐसे विरोधियों से डराकर जीवन पाती हैं जिन्हें अपने से अधिक बुरा बताती हैं। “नास्तिकों की रिक्तियों का ईश्वर” में यह बहुत स्पष्ट था।
समापन: अगले एपिसोड का प्रश्न
इसके बाद, भाइयो, वह प्रश्न बचा है जो शुरुआत से बहुतों ने बार-बार पूछा और जिसका उत्तर जानबूझकर टाला। क्यों मानते हो कि विकासवाद इस्लाम से टकराता है? उससे धर्म का मेल क्यों न करें, जैसा कुछ पश्चिमियों ने अपने धर्म से किया? अगले एपिसोड में, अल्लाह ने चाहा तो, पर्याप्त और संतोषजनक उत्तर देंगे। अस्सलामु अलैकुम।