अल्लाह गवाही देता है

चिंतन का निमंत्रण

क़ुरआन अपनी आयतों, सृष्टि, जीवन और आख़िरत पर चिंतन का निमंत्रण देता है। जानिए कि इन विषयों पर विचार अल्लाह की पहचान को कैसे गहरा करता है।

चिंतन का निमंत्रण

क़ुरआन की आयतों पर चिंतन

क़ुरआन मनुष्यों को अल्लाह की ओर से मिली अंतिम वह्य है। इसलिए हर व्यक्ति का दायित्व है कि इस किताब का अध्ययन करे और उसके विषय पर विचार करे। अल्लाह बताता है कि क़ुरआन इसलिए उतारा गया कि लोग उसकी आयतों पर चिंतन करें:

यह (क़ुरआन) एक पुस्तक है, हमने इसे आपकी ओर उतारा है, बहुत बरकत वाली है, ताकि वे इसकी आयतों पर विचार करें, और ताकि बुद्धि वाले लोग (इससे) उपदेश ग्रहण करें।क़ुरआन — सूरह Saad (38:29)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह चिंतन का महत्व स्पष्ट करता है। इसीलिए क़ुरआन में “क्या तुम विचार नहीं करते?” और “इसमें चिंतन करने वालों के लिए निशानियाँ हैं” जैसे वाक्य बार-बार आते हैं। विचार के निमंत्रण और चिंतन के विषय असीम हैं। अल्लाह लोगों को ब्रह्मांड की असाधारण व्यवस्था, धरती के जीवों और उनके पूर्ण तंत्रों, जीवन की घटनाओं, निरंतर मिलने वाली नेमतों, इनकार करने वालों पर आने वाली विपत्तियों, जन्नत, जहन्नम और अनंत जीवन आदि पर विचार करने को कहता है। हर विषय पर चिंतन हमें अल्लाह की सर्वशक्तिमत्ता, हिकमत, ज्ञान, रचना-कौशल और दूसरे गुणों की अधिक गहरी पहचान देता है।

अल्लाह मनुष्य को अपनी रचना पर विचार करने को कहता है।

तथा मनुष्य कहता है : जब मैं मर गया, तो क्या मैं सचमुच फिर जीवित करके निकाला जाऊँगा?और क्या मनुष्य याद नहीं करता कि निःसंदेह हम ही ने उसे इससे पूर्व पैदा किया, जबकि वह कुछ भी नहीं था?क़ुरआन — सूरह Maryam (19:66–67)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को ब्रह्मांड की रचना पर विचार करने को कहता है।

निःसंदेह आकाशों और धरती की रचना तथा रात और दिन के बदलने में, तथा उन नावों में जो लोगों को लाभ देने वाली चीज़ें लेकर सागरों में चलती हैं, और उस पानी में जो जो अल्लाह ने आकाश से उतारा, फिर उसके द्वारा धरती को उसकी मृत्यु के पश्चात् जीवित कर दिया और उसमें हर प्रकार के जानवर फैला दिए, तथा हवाओं को फेरने (बदलने) में और उस बादल में, जो आकाश और धरती के बीच वशीभूत[83] किया हुआ है, (इन सब चीज़ों में) उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो समझ-बूझ रखते हैं।[83] अर्थात इस विश्व की पूरी व्यवस्था इस बात का तर्क और प्रमाण है कि इसका व्यवस्थापक अल्लाह ही एक मात्र पूज्य तथा अपने गुणों एवं कर्मों में अकेला है। अतः उपासना भी उसी एक की होनी चाहिए। यही समझ-बूझ का निर्णय है।क़ुरआन — सूरह Al-Baqara (2:164)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को संसार की अस्थायी प्रकृति पर विचार करने को कहता है:

और निश्चय ही वह स्त्री उसकी इच्छा कर चुकी थी। और वह (यूसुफ़) भी उसकी इच्छा कर लेता, यदि अपने पालनहार का प्रमाण न देख लेता।[7] हमने ऐसा इसलिए किया ताकि बुराई एवं अश्लीलता को उससे दूर रखें। वास्तव में, वह हमारे चुने हुए बंदों में से था।[7] यूसुफ़ अलैहिस्सलाम कोई फ़रिश्ता नहीं एक मनुष्य थे। इसलिए बुराई का इरादा कर सकते थे, किंतु उसी समय उनके दिल में यह बात आई कि मैं पाप करके अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकूँगा। इस प्रकार अल्लाह ने उन्हें बुराई से बचा लिया, जो यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की बहुत बड़ी प्रधानता है।क़ुरआन — सूरह Yusuf (12:24)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को अपनी नेमतों पर विचार करने को कहता है:

तथा वही है, जिसने धरती को फैलाया और उसमें पर्वत और नदियाँ बनाईं और प्रत्येक फल के दो-दो प्रकार बनाए। वह रात को दिन पर उढ़ा देता है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो सोच-विचार करते हैं।और धरती में आपस में मिले हुए विभिन्न खंड हैं, तथा अंगूरों के बाग़, खेती और खजूर के पेड़ हैं, कई तनों वाले और एक तने वाले, जो एक ही जल से सींचे जाते हैं, और हम उनमें से कुछ को स्वाद आदि में कुछ से बढ़ा देते हैं। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो सूझ-बूझ रखते हैं।क़ुरआन — सूरह Ar-Ra'd (13:3–4)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह मनुष्य को इस बात पर विचार करने को कहता है कि पूरा ब्रह्मांड उसके लिए बनाया गया है:

और उसने तुम्हारे लिए जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है सबको अपनी ओर से वश में कर रखा है। निःसंदेह उसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो चिंतन करते हैं।क़ुरआन — सूरह الجاثية (45:13)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

वह तुम्हारे लिए उससे खेती, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और प्रत्येक प्रकार के फल उगाता है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बड़ी निशानी है, जो सोच-विचार करते हैं।और उसने रात और दिन, सूर्य और चाँद को तुम्हारे लिए कार्यरत कर रखा है, तथा तारे भी उसके आदेश के अधीन हैं। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो समझ-बूझ रखते हैं।तथा उसने तुम्हारे लिए धरती में जो विभिन्न रंगों की चीज़ें पैदा की हैं (उन्हें भी तुम्हारे वश में किया)। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बड़ी निशानी है, जो शिक्षा ग्रहण करते हैं।और वही है, जिसने सागर को (तुम्हारे) वश में कर दिया, ताकि तुम उससे ताज़ा मांस[4] खाओ और उससे आभूषण[5] निकालो, जिसे तुम पहनते हो। तथा तुम नौकाओं को देखते हो कि उसमें पानी को चीरती हुई चलती हैं, और ताकि तुम उसका कुछ अनुग्रह[6] तलाश करो और ताकि तुम शुक्रिया अदा करो।[4] अर्थात मछलियाँ।
[5] अर्थात मोती और मूँगा निकालो।
[6] अर्थात सागरों में व्यापारिक यात्रा करके अपनी जीविका की खोज करो।
और उसने धरती में पर्वत गाड़ दिए, ताकि वह (धरती) तुम्हें लेकर डगमगाने न लगे तथा नदियाँ और रास्ते बनाए, ताकि तुम मंज़िल तक पहुँच जाओ।तथा बहुत-से चिह्न (बनाए)। और वे सितारों से रास्ता[7] मालूम करते हैं।[7] अर्थात रात्रि में।तो क्या वह जो (ये सब चीज़ें) पैदा करता है, उसके समान है, जो (कुछ भी) पैदा नहीं करता? फिर क्या तुम उपदेश ग्रहण नहीं करते?[8][8] और उसकी उत्पत्ति को उसका साझी और पूज्य बनाते हो।
क़ुरआन — सूरह An-Nahl (16:11–17)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को स्वयं अपने भीतर विचार करने को कहता है:

क्या उन लोगों ने अपने दिलों में विचार नहीं किया कि अल्लाह ने आकाशों और धरती को और उन दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों[3] को सत्य के साथ और एक निश्चित अवधि के लिए ही पैदा किया है?! और निःसंदेह बहुत-से लोग अपने पालनहार से मिलने का इनकार करते हैं।[3] संसार की व्यवस्था बता रही है कि यह अकारण नहीं, बल्कि इसका कुछ अभिप्राय है।क़ुरआन — सूरह Ar-Room (30:8)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को अच्छे मूल्यों और कर्मों पर विचार करने को कहता है:

निःसंदेह अल्लाह न्याय और उपकार और निकटवर्तियों को देने का आदेश देता है और अश्लीलता और बुराई और सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम नसीहत हासिल करो।क़ुरआन — सूरह An-Nahl (16:90)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

ऐ ईमान वालो![18] अपने घरों के सिवा अन्य घरों में प्रवेश न करो, यहाँ तक कि अनुमति ले लो और उनके रहने वालों को सलाम कर लो।[19] यह तुम्हारे लिए उत्तम है, ताकि तुम याद रखो।[18] सूरत के आरंभ में ये आदेश दिए गए थे कि समाज में कोई बुराई हो जाए, तो उसका निवारण कैसे किया जाए? अब वे आदेश दिए जा रहे हैं जिनसे समाज में बुराइयों को जन्म लेने ही से रोक दिया जाए।
[19] ह़दीस में इसका नियम यह बताया गया है कि (द्वार पर दाएँ या बाएँ खड़े होकर) सलाम करो। फिर कहो कि क्या भीतर आ जाऊँ? ऐसे तीन बार करो, और अनुमति न मिलने पर वापस हो जाओ। (बुख़ारी : 6245, मुस्लिम : 2153)
क़ुरआन — सूरह An-Noor (24:27)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को आख़िरत, क़ियामत की घड़ी और हिसाब के दिन पर विचार करने को कहता है।

 

तथा हमारे बंदों इबराहीम और इसहाक़ और याक़ूब को याद करो, जो हाथों (शक्ति) वाले और आँखों (अंतर्दृष्टि)[13] वाले थे।[13] अर्थात आज्ञापालन में शक्तिवान तथा धर्म का बोध रखते थे।हमने उन्हें एक खास विशेषता के साथ चुन लिया, जो असल घर (आख़िरत) की याद है।क़ुरआन — सूरह Saad (38:45–46)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

तो वे किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं सिवाय क़ियामत के कि वह उनपर अचानक आ जाए? तो निश्चय उसकी निशानियाँ[6] आ चुकी हैं, फिर जब वह उनके पास आ जाएगी, तो उनके लिए नसीहत ग्रहण करना कैसे संभव होगा?[6] आयत में कहा गया है कि प्रलय के लक्षण आ चुके हैं। और उनमें सब से बड़ा लक्षण आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का आगमन है। जैसा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन है कि आपने फरमाया : "मेरा आगमन तथा प्रलय इन दो उंग्लियों के समान है।" (सह़ीह़ बुख़ारी 4936) अर्थात बहुत समीप है। जिसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार दो उंग्लियों के बीच कोई तीसरी उंगली नहीं, इसी प्रकार मेरे और प्रलय के बीच कोई नबी नहीं। मेरे आगमन के पश्चात् अब प्रलय ही आएगी।क़ुरआन — सूरह Muhammad (47:18)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह मनुष्य को अपने पैदा किए जीवों पर विचार करने को कहता है।

 

और तेरे पालनहार ने मधुमक्खी को प्रेरित किया कि कुछ पर्वतों में से घर (छत्ते) बना तथा कुछ वृक्षों में से और कुछ उसमें से जो लोग छप्पर बनाते हैं।फिर हर तरह के फलों से खा, फिर अपने पालनहार के प्रशस्त किए हुए रास्तों पर चल। उनके पेटों से विभिन्न रंगों का एक पेय निकलता है, जिसमें लोगों के लिए आरोग्य (शिफ़ा) है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय एक निशानी है, जो सोच-विचार करते हैं।क़ुरआन — सूरह An-Nahl (16:68–69)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह मनुष्य को उन यातनाओं पर विचार करने को कहता है जो अचानक आ सकती हैं।

(ऐ नबी!) उनसे कहो, भला बताओ तो सही कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना आ जाए, या तुमपर क़ियामत आ जाए, तो क्या तुम अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारोगे? यदि तुम सच्चे हो।क़ुरआन — सूरह Al-An'aam (6:40)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

ऐ नबी! आप कह दें कि भला बताओ तो सही कि यदि अल्लाह तुम्हारे सुनने तथा देखने की शक्ति छीन ले और तुम्हारे दिलों पर मुहर लगा दे, तो अल्लाह के सिवा कौन-सा पूज्य है, जो तुम्हें ये चीज़ें लाकर दे? देखो, हम कैसे तरह-तरह से आयतें[36] बयान करते हैं, फिर (भी) वे मुँह फेर लेते[37] हैं।[36] अर्थात इस बात की निशानियाँ कि अल्लाह ही पूज्य है, और दूसरे सभी पूज्य मिथ्या हैं। (इब्ने कसीर)
[37] अर्थात सत्य से।
आप कह दें, भला बताओ तो सही कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना अचानक या खुल्लम-खुल्ला आ जाए, तो क्या अत्याचारी लोगों के सिवा कोई और विनष्ट किया जाएगा?
क़ुरआन — सूरह Al-An'aam (6:46–47)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5


और निःसंदेह हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की, इसके पश्चात् कि हमने पहली नस्लों को विनष्ट कर दिया, जो लोगों के लिए अंतर्दृष्टिपूर्ण तर्क तथा मार्गदर्शन और दया थी, ताकि वे नसीहत ग्रहण करें।क़ुरआन — सूरह Al-Qasas (28:43)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

और निःसंदेह हमने तुम्हारे जैसे कई समूहों को विनष्ट कर दिया, तो क्या है कोई नसीहत हासिल करने वाला?क़ुरआन — सूरह Al-Qamar (54:51)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह मनुष्य को क़ुरआन पर विचार करने को कहता है।

तो क्या वे क़ुरआन पर चिंतन मनन नहीं करते? यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत-सा अंतर्विरोध (असंगति) पाते।[57][57] अर्थात जो व्यक्ति क़ुरआन पर चिंतन करेगा, उसपर यह तथ्य खुल जाएगा कि क़ुरआन अल्लाह की वाणी है।क़ुरआन — सूरह النساء (4:82)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5


यह (क़ुरआन) एक पुस्तक है, हमने इसे आपकी ओर उतारा है, बहुत बरकत वाली है, ताकि वे इसकी आयतों पर विचार करें, और ताकि बुद्धि वाले लोग (इससे) उपदेश ग्रहण करें।क़ुरआन — सूरह Saad (38:29)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5


और इसी प्रकार हमने इसे अरबी क़ुरआन बनाकर अवतरित किया तथा इसमें चेतावनी की बातें विभिन्न प्रकार से वर्णन कीं, शायद कि वे डर जाएँ, अथवा यह उनके लिए कोई उपदेश पैदा कर दे।क़ुरआन — सूरह Taa-Haa (20:113)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5


(ऐ नबी!) आप कह दें : मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, और न मैं परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ, और न मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो मेरी ओर वह़्य (प्रकाशना) की जाती है। आप कह दें : क्या अंधा[38] और देखने वाला बराबर होते हैं? तो क्या तुम सोच-विचार नहीं करते?[38] अंधा से अभिप्राय : सच से विचलित है। इस आयत में कहा गया है कि नबी, मानव पुरुष से अधिक और कुछ नहीं होता। वह सत्य का अनुयायी तथा उसी का प्रचारक होता है।क़ुरआन — सूरह Al-An'aam (6:50)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

और उसकी जाति ने उससे झगड़ा किया, उसने कहा : क्या तुम मुझसे अल्लाह के विषय में झगड़ते हो, हालाँकि निश्चय उसने मुझे मार्गदर्शन प्रदान किया है तथा मैं उससे नहीं डरता, जिसे तुम उसके साथ साझी बनाते हो। परंतु यह कि मेरा पालनहार कुछ चाहे। मेरे पालनहार ने प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान से घेर रखा है। तो क्या तुम उपदेश ग्रहण नहीं करते?क़ुरआन — सूरह Al-An'aam (6:80)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5

अल्लाह लोगों को मृत्यु और सपनों पर विचार करने को कहता है।

अल्लाह ही प्राणों को उनकी मौत के समय क़ब्ज़ करता है, तथा जिसकी मौत का समय नहीं आया, उसकी नींद की अवस्था में। फिर (उसे) रोक लेता है, जिसके बारे में मौत का निर्णय कर दिया हो तथा अन्य को एक निर्धारित समय तक के लिए भेज देता है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय कई निशानियाँ हैं, जो मनन-चिंतन[8] करते हैं।[8] इस आयत में बताया जा रहा है कि मरण तथा जीवन अल्लाह के नियंत्रण में हैं। निद्रा में प्राणों को खींचने का अर्थ है, उनकी संवेदन शक्ति को समाप्त कर देना। अतः कोई इस निद्रा की दशा पर विचार करे, तो यह समझ सकता है कि अल्लाह मुर्दों को भी जीवित कर सकता है।क़ुरआन — सूरह Az-Zumar (39:42)स्रोत : QuranEnc.com — Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari — v1.1.5